जौनपुर के अदारी डभिया गांव निवासी सभाजीत यादव की हकीकत भी हरियाणा के भिवानी जिले के बलाली गांव निवासी महावीर फोगाट सरीखी ही है। महावीर फोगाट की आज दुनिया के हर कोने में गूंज है, तो इसलिए क्योंकि आमिर खान जैसे बॉलीवुड के दिग्गज कलाकार ने दंगल फिल्म में सिनेमाई पर्दे पर उनके किरदार निभाया।
महावीर फोगाट की छोरियों की तरह जौनपुर के सभाजीत की लगन व मेहनत को सार्थक कर रहे उनके छोरे
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सभाजीत यादव की पहचान इलाके में मैराथन धावक के रूप में है। दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु सहित कई शहरों में वह हाफ व फुल मैराथन में पदक जीत चुके हैं। 60 की उम्र में भी खेलों के प्रति उनका जोश कम नहीं हुआ है।
आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाली मैराथन में हिस्सा लेने को वह तत्पर रहते हैं। बताते हैं कि उनका सपना था कि वह देश के लिए खेलें और मेडल जीतें। पर गरीबी के चलते वह पांचवीं से आगे नहीं पढ़ सके और फिर पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण सपना भी छोड़ना पड़ा।
गांव में खेत में बेटों को देनी शुरू की ट्रेनिंग
वह पूरी तरह से खेती-किसानी में जुट गए, लेकिन देश के लिए मेडल जीतने की तमन्ना मन में बनी रही। इसके लिए उन्होंने अपने बेटों को तराशना शुरू किया। गांव में सुविधाएं सीमित थीं और शहर तक भेजने के लिए पैसे नहीं थे।
लिहाजा खेतों में ही तीन बेटों रोहन, रोहित और संतोष को एथलेटिक्स की ट्रेनिंग देनी शुरू की। वह खुद धावक थे, लेकिन संभावनाओं को देखते हुए बच्चों को जेवलिंग से जोड़ा। पिता की लगन, मेहनत को सार्थक करने में बच्चों ने भी कसर नहीं छोड़ी।
रोहित दक्षिण अफ्रीका में कर रहा ट्रेनिंग
मझले बेटे रोहित ने जब जिला, मंडल, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के बाद स्कूली गेम की विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता तो अचानक से लोगों की उसकी ओर नजर गई। खेल दिवस पर उन्हें प्रदेश सरकार ने सम्मानित भी किया।
प्रतिभा को परखते हुए स्पोर्टस अथाॅरिटी ऑफ इंडिया ने उसे विशेष ट्रेनिंग के लिए साऊथ अफ्रीका भेजा है, जहां वह जर्मन कोच क्लाफस बर्टोनिज और सीनियर खिलाड़ी नीरज चोपड़ा के साथ कड़ा अभ्यास कर जुलाई में होने वाली अंडर-20 की विश्व चैंपियनशिप की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
सभाजीत के बड़े पुत्र रोहन भी जिला स्तर की प्रतियोगिताओं में कई मेडल जीत चुके हैं, मगर कंधे की चोट से उनका अभियान थोड़ा सुस्त पड़ गया। छोटा बेटा संतोष भी पिता की देखरेख में निरंतर अभ्यास कर अपनी प्रतिभा को निखारने में जुटा है।
मुश्किलें झेली पर हार नहीं मानी
ग्रामीण क्षेत्रों में कहावत प्रचलित है कि खेलोगे-कूदोगे होगे खराब और पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब...। सभाजीत के सामने ऐसे ही मुश्किल थी। खुद का बचपन और जवानी अभावों में बिताने के बाद वह बच्चों को काबिल बनाने के लिए उनकी अच्छी शिक्षा-दीक्षा का रास्ता चुन सकते थे, लेकिन देश के लिए मेडल जीतने का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने सारी चुनौतियों को दरकिनार कर बेटों को खेल में आगे बढ़ाने का फैसला लिया। शुरुआत में गांव-परिवार में विरोध भी हुआ, लेकिन वह डिगे नहीं।
इसलिए चुना जेवलिंग
सभाजीत ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। खेती भी बहुत बड़ी नहीं है। बस इसलिए उन्होंने बच्चों के लिए जेवलिंग को चुना। अन्य खेलों के सापेक्ष जेवलिंग में कम संसाधनों की जरुरत होती है। खाली खेतों में भी वह इसकी ट्रेनिंग करा सकते हैं। इसके खिलाड़ी को बहुत अच्छी डायट की भी जरुरत नहीं होती।