रात नहीं ख्वाब बदलता है, मंजिल नही कारवां बदलता है... जज्बा रखो जीतने का क्योंकि, किस्मत बदले न बदले पर वक्त जरूर बदलता है... मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है... इन पंक्तियों को सार्थक कर रही हैं शहर की कई बेटियां और महिलाएं, जिन्हें कोमल और कमजोर माना जाता है। आज वह कई अलग-अलग क्षेत्रों में कामयाबी की इबारत लिखकर परचम फहरा रही हैं। विश्व मलाला दिवस पर हम आपको बता रहे हैं शहर की ऐसी ही कुछ सशक्त युवतियों और महिलाओं की कहानी... पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
मलाला से कम नहीं हैं काशी की बेटियां, दो ने तो दिव्यांगता के साथ लिखी नई इबारत
जुनून, जज्बा और जोश की जीवंत प्रतीक हैं रानी लक्ष्मीबाई वीरता पुरस्कार की विजेता सुमेधा पाठक। रीढ़ की हड्डी में संक्रमण के चलते सुमेधा असाध्य बीमारी से ग्रसित हैं। मानस नगर निवासी दवा व्यवसायी बृजेश चंद्र पाठक की बेटी सुमेधा 2013 में 10वीं की परीक्षा दे रही थी, तीन पेपर देने के बाद संक्रमण की वजह से वह आगे परीक्षा नहीं दे सकी और एक साल तक उनकी पढ़ाई भी बाधित रही। इसके बाद 2016 में उन्होंने दिव्यांग श्रेणी में सीबीएसई की परीक्षा में ऑल इंडिया टॉप किया। उन्होंने पढ़ाई के साथ निशानेबाजी सीखी। महज छह महीने के अभ्यास के बाद स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में दिव्यांग वर्ग में गोल्ड मेडल जीता। सुमेधा प्री नेशनल में उत्तर प्रदेश से मेडल पाने वाली एकमात्र खिलाड़ी हैं। शिक्षा और खेल के क्षेत्र में अच्छा करने के साथ सुमेधा एक कुशल एंकर और सोशल एक्टिविस्ट भी है।
पांडेयपुर निवासी एक बेटी ने दहेज लोभियों को अपनी कला से जवाब दिया। दिव्यांग आर्टिस्ट पूनम राय को उनके ससुराल वालों ने तीसरी मंजिल से जमीन पर फेंक दिया था। इसके बाद वह 17 साल तक बेड पर पड़ी रही। डॉक्टर के जवाब देने के बाद भी पूनम ने अपना हौसला कम नहीं होने दिया। आज अपने हुनर के जरिये उन्होंने अपने नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बना लिया है। पूनम ने 17 दिनों में छह फुट आठ इंच चौड़े और छह फुट लंबे कैनवास पर 648 महिलाओं की विभिन मुद्राओं में चेहरे उकेर कर उनका दर्द और उनकी खुशी दुनिया के सामने रखी।
प्रतिभा का संघर्ष लगातार जारी रहता है जब तक कि उसे अपनी मंजिल न मिल जाए। यह बात मूल रूप से गाजीपुर निवासी शमा पर सटीक बैठती है। एक वक्त था जब दसवीं के बाद पढ़ाई के लिए शमा को मना कर दिया गया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। संघर्षों को पार करते हुए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और प्राइवेट स्कूल से 12वीं पास की। पढ़ाई की उनकी ललक ने उन्हें काशी पहुंचा दिया। यहां पहुंचने के बाद उन्होंने बीएससी की पढ़ाई पूरी की। शमा का सपना एमबीबीएस करने का है, जिसके लिए वह आज भी पढ़ाई कर रही है। पढ़ाई के साथ शमा नेटवर्क कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं।
सिगरा निवासी शुभी नाज ने संघर्षों को पार कर खुद को पैरों पर खड़ा किया और बेटे को डॉक्टर बनाया। दो साल की उम्र में पिता का साया खोने वाली शुभी ने अपने बेटे को कभी पिता की कमी महसूस होने नहीं दी। बीएचयू से स्नातक करने के बाद उनकी शादी हुई, 1996 में उन्हें बेटा पैदा हुआ। बेटे के जन्म के बाद ही उनका तलाक हो गया। इसके बाद उन्होंने फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई की। बेटे को अकेले पालने के साथ बेहतर शिक्षा दिलाई। आज उनकी मेहनत की बदौलत ही उनका बेटा आईसीआर मुंबई में डॉक्टर है। एक छोटी सी दुकान से शुरू हुए उनके सफर के बाद आज गुरुबाग में उनकी खुद की बुटीक है।