आईआईटी बीएचयू में चार दिवसीय डेस्टीनेशन नार्थ ईस्ट के समापन समारोह में कौशल विकास मंत्री डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत विकास के पथ पर तेजी से बढ़ता जा रहा है। आर्थिक विकास के साथ ही यातायात और कौशल विकास के क्षेत्र में भी काम हो रहे हैं। युवाओं को कौशल विकास की तकनीक से रूबरू कराए जाने के लिए कौशल विकास केंद्र खोले जाने के साथ ही कई योजनाएं चलाई जा रही हैं।
आईआईटी के तकनीकी ग्राउंड में आयोजित समारोह में बतौर मुख्य अतिथि डॉ. पांडेय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जल्द ही भारतीयों का सपना पूरा होगा और वह थाइलैंड से आगे तक की यात्रा सड़क मार्ग से कर सकेंगे। अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से पूर्वोत्तर राज्यों की तस्वीर बदलने की कवायद चल रही है। इसमें बहुत जल्द ही गुवाहाटी में कौशल विकास केंद्र खोला जाएगा।
उन्होंने कहा कि इस तरह के उत्सवों से आने वाले दिनों में काशीवासियों की आकांक्षाएं बढ़ी हैं। इसको देखते हुए समय-समय पर इस तरह के कार्यक्रम कराए जाते रहेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन देश ही नहीं विदेशों में बढ़ रहा है। इससे न केवल लोगों को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं बल्कि सड़क, बिजली सहित अन्य सुविधाओं में इजाफा हो रहा है।
केंद्रीय मंत्री ने इस दौरान मेघालय में सिक्किम, मेघालय में आर्गेनिक खेती की चर्चा की । केंद्रीय राज्यमंत्री रामेश्वर तेली ने केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले विकास कार्यों की चर्चा की। इस दौरान पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, मणिपुर सरकार के मंत्री जयंत कुमार सिंह, के चेलाई, प्रशांत, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर प्रवीण कुमार, आईआईटी बीएचयू के निदेशक प्रो. प्रमोद कुमार जैन आदि लोग मौजूद रहे।
पूर्वोत्तर के कलाकारों ने पूरब में बिखेरी चमक
पूर्वी भारत के आठ राज्यों की मिट्टी में रची-बसी कला व संस्कृ ति की इंद्रधनुषी छटा चार दिनों तक काशी में छाई रही। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों द्वारा पेश नृत्य व संगीत ने काशी वासियों को अभिभूत कर दिया। मेले में अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा के शिल्पकारों, कलाकारों, चित्रकारों ने कला, संस्कृति, हस्तशिल्प, संगीत को यहां आने वाले लोगों से रूबरू कराया। खुले मैदान में सजे मंच पर कहीं चित्रकार अपनी चित्रकला का प्रदर्शन कर रहे थे तो कहीं नर्तक लोक नृत्यों की प्रस्तुत दे रहे थे। शिल्पकार भी अपनी कला को मूर्त रूप देने में पीछे नहीं थे।