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जानिए वो किस्सा जब काशी के तीन युवाओं से मिलने बनारस आए थे स्वामी विवेकानंद

Tue, 11 Sep 2018 03:56 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी Updated Tue, 11 Sep 2018 03:56 PM IST
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Know that story when swami vivekananda visit varanasi
स्वामी विवेकानंद - फोटो : SELF
स्वामी विवेकानंद की जब भी बात होती है तो अमेरिका के शिकागो की धर्म संसद में साल 1893 में दिए गए भाषण की चर्चा जरूर होती है। ये वो भाषण है जिसने पूरी दुनिया के सामने भारत को एक मजबूत छवि के साथ पेश किया। आज ही के दिन वो भाषण दिया गया था। आज हम आपको वो किस्सा बताने जा रहे हैं जब  स्वामी जी 1902 में अपनी दूसरी विदेश यात्रा से लौटे तो सबसे पहले काशी आए। आगे की स्लाइड्स में पढ़ें.....



 
Know that story when swami vivekananda visit varanasi
swami - फोटो : swami

केदारनाथ, जामिनी रंजन और चारुचंद्र दास...। वाराणसी के लक्सा स्थित रामकृष्ण मिशन अस्पताल की नींव रखने वाले इन तीन युवाओं से स्वामी विवेकानंद खुद मिलने काशी आए थे। स्वामी विवेकानंद से ही प्रेरणा लेकर इन तीन युवाओं ने गंगा किनारे रामापुरा में दो कमरे के मकान में गरीबों और असहायों की सेवा करनी शुरू की थी। स्वामी जी 1902 में जब अपनी दूसरी विदेश यात्रा से लौटे तो सबसे पहले काशी आए। काशी आने पर उन्हें लोगों ने बताया कि आपकी प्रेरणा से यहां के युवाओं ने एक चिकित्सालय की स्थापना की है। वह बेहद खुश हुए और उनसे मिलने पहुंच गए।

 
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swami - फोटो : swami
जब उन्होंने अस्पताल का नाम देखा तो गंभीर हो गए। युवाओं ने अस्पताल का नाम रखा था ‘पूअर मेंस रिलीफ एसोसिएशन’। इस पर स्वामी जी का सवाल था-‘आप राहत देने वाले कौन होते हैं?’स्वामी विवेकानंद ने खुद उस अस्पताल का नाम रखा ‘होम ऑफ सर्विस’। बाद में यह रामकृष्ण मिशन से जुड़ गया। मिशन के सचिव स्वामी ऋतानंद बताते हैं कि देश भर में रामकृष्ण मिशन है लेकिन काशी में ये इकलौता ‘राम कृष्ण मिशन होम ऑफ सर्विस’ है। 1902 में जब स्वामी विवेकानंद काशी आए, उस वक्त बृंगा के तपस्वी राजा उदय प्रताप सिंह की उनसे मिलने की इच्छा हुई ।

 
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swami

लेकिन उन्होंने ये व्रत ले रखा था कि वह मृत्यु तक अपने भोजूबीर स्थित बगीचे में ही रहेंगे। एक संन्यासी ने ही विवेकानंद को उनकी इच्छा के बारे में बताया। वह फौरन राजा से मिलने पहुंच गए ताकि उनका व्रत न टूटे। दोनों में वेदांत पर चर्चा हुई। राजा ने स्वामी जी को वेदांत के प्रचार के लिए 500 रुपये दान में दिए। इसी दान से लक्सा स्थित अस्पताल परिसर में रामकृष्ण अद्वैत आश्रम बनाया गया। हालांकि तब तक स्वामी जी ने महासमाधि ले ली थी। स्वामी वरिष्ठानंद बताते हैं कि अपने अंतिम काशी आगमन से पहले स्वामी विवेकानंद 1880 में भी आए थे।
 
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swami vivekananda

उस वक्त वह संकट मोचन मंदिर दर्शन करने पहुंचे थे। वहां से निकलने के दौरान बंदर उनका पीछा करने लगे। वह भागे लेकिन बंदरों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। दुर्गा कुंड मंदिर के पास एक संन्यासी ने उन्हें रोका। कहा, ‘रुको, पशुओं का सामना करो’। इस पर वह रुके और बंदरों को सामना किया। यहीं से उन्हें ये सीख भी मिली कि चुनौतियों से भागना नहीं बल्कि उनका सामना करना चाहिए और यही सीख उन्होंने विश्व को दी। माना जाता है कि स्वामी विवेकानंद की मां संतान प्राप्ति के लिए कोलकाता से काशी आईं थीं
 
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