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कांची कोटि मठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के निधन से काशी में संत समाज मर्माहत

Thu, 01 Mar 2018 02:05 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Updated Thu, 01 Mar 2018 02:05 PM IST
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kanchi mutt shankaracharya jayendra saraswathi passes away
varanasi - फोटो : अमर उजाला
 कांचीकामकोटि के शंकराचार्य स्वामी जयेद्र सरस्वती बुधवार को ब्रह्मलीन हो गए। उनके निधन की सूचना मिलते ही मठ में उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई। सनातन परंपरा की एक मजबूत कड़ी टूटने से पूरा संत समाज मर्माहत है। हनुमानघाट स्थित कांचीकोटि मठ में उनके अनुयायी और भक्तों ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की उपस्थिति में शांति पाठ किया और पुष्पांजलि अर्पित की। आगे की स्लाइड्स में देखें...
kanchi mutt shankaracharya jayendra saraswathi passes away
varanasi - फोटो : अमर उजाला

उनके निधन की जानकारी होते ही कांची मठ के प्रबंधक वीएस सुब्रह्मण्यम मणि एवं गुरुचरण सेवा समिति के संस्थापक श्रीनारायण घनपाठी कांचीपुरम के लिए रवाना हो गए। तमिलनाडु के थंजाउर में 18 जुलाई 1935 में जन्मे जयेंद्र सरस्वती का बुधवार को निधन होने काशी का हर वर्ग शोक में है। सनातनी परंपरा के सच्चे संत का काशी से गहरा नाता रहा। यही कारण है कि स्वामी जयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य बनने के बाद पहली बार 1973 में काशी आए थे। 
kanchi mutt shankaracharya jayendra saraswathi passes away
varanasi - फोटो : अमर उजाला

माधवाचार्य मठ के व्यवस्थापक भाऊ आचार्य टोनपे के अनुसार वह अपने तीन सौ अनुयायियों के साथ कांची से पैदल करीब तीन हजार किमी की यात्रा कर काशी पहुंचे थे। उनके गुरु जयेंद्र चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती के बाद उन्होंने यह गद्दी संभाली थी। सात मार्च 2011 में गांधी-नेहरू परिवार के वरुण गांधी की शादी भी काशी के उनकी उपिस्थति में कांची कोटि कामेश्वर मंदिर से हुई। 
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jayandra - फोटो : अमर उजाला

इससे पहले स्वामी जयेंद्र चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती पहली बार 1934 में हनुमानघाट स्थित इस मठ में आए थे तब इसका नाम सुखदेव मठ था। बाद में कांचीकोटि मठ के नाम से विख्यात हुआ। भाऊ आचार्य टोनपे ने बताया कि कांची से पैदल रामनगर पहुंचे। वहां किले से उनका राजशाही स्वागत हुआ। हाथी, घोड़े और ऊँट, बैंड बाजे के साथ वह मठ में पहुंचे थे।
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jayandra - फोटो : twitter

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद से उनके वैचारिक मतभेद रहे। लेकिन जब स्वामी स्वरूपानंद ने गंगा के निर्मल और अविरलता को लेकर आवाज उठाई तो स्वामी जयेंद्र सरस्वती ने उनका समर्थन किया। उन्होंने गंगा के मसले को हर स्तर से हल करने की पहल की। शंकराचार्य स्वामी सरस्वती के निधन काशी के संत समाज में शोक है। 
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