कभी काशी की होली अपना अलग ही अंदाज रखती थी। होली की ठिठोली और इसके रंग यहां के लोगों पर महीने-दो महीने पहले ही चढ़ जाया करते थे। ज्यों-ज्यों होली नजदीक आती हुड़दंग का रंग और चटख होता जाता। कहीं फागुन के गीत गूंजते तो कहीं रचनाकारों की होलियाना कविताएं लोगों का मनोरंजन करतीं। अस्सी और दशाश्वमेध स्थित डेढ़सी के पुल पर होने वाले कवि सम्मेलन तो पूरे शहर का मिजाज ही होलियाना कर देते थे। मगर अब सब कुछ बदल सा गया है। चार-पांच दशक में होली के मिजाज और उल्लास में आए बदलावों को समझने के लिए शहर के कुछ मशहूर लोगों से बात की तो उन्होंने अपने अनुभव साझा किए। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
काशी में भभूत से ही नहीं प्रेत से भी खेली जाती है होली, ऐसा होता था होलियाना अंदाज
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पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि शिव की नगरी काशी में होली का एक अलग ही रंग नजर आता है। यहां नाथ से, भस्म से, भभूत से, रेत से और प्रेत से होली खेली जाती है। रंग-भंग, गारी और लोक संगीत की जुगलबंदी वाले शहर की होली का आकर्षण हर किसी को बांध ही लेता है। जहां गाली भी लगे खुशियों की धुन 'गा ली' तब यहां होती है होली। उन्होंने कहा कि होली ही एक ऐसा त्योहार जब लोग खुलकर मिलते हैं। गाली देकर भी प्रसन्न करने की अभिलाषा होती है। गाली भी मजा देती है। कुंठाएं निकल जाती हैं। होली में शरीर ही नहीं मन भी इंद्रधनुषी हो जाता है। मुस्कराहट के साथ रस से भरी गाली और मर्यादित हुल्लड़बाजी बनारस में ही संभव है। यहां होली में हंसी-ठिठोली के साथ गाली दुर्भावना नहीं, अपनत्व को दर्शाती है। जो आज के युवाओं को भी अपनानी चाहिए।
साहित्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल बताते हैं कि होली बसंत का राग है और मिलन का उत्सव है। जहां लोग पहले बांस की पिचकारियों से एक-दूसरों को रंगों में सराबोर करते थे। घरों में ठंडई और भाग खिलाई-पिलाई जाती थी। गंगा के घाटों पर कवियों की टोलियां अपनी महफिल सजाती थीं। मगर अब यहां का होलियाना अंदाज धीरे-धीरे गायब हो चला है। होली अब हाई-टेक होकर निशप्राण हो गई है, जो चिंता का विषय है।
साहित्यकार डॉ. शशिकला त्रिपाठी की माने तो अब जो बदलाव से बिखराव आ गया, वह केवल रंग ही नहीं ले गया, तन-मन की उमंग, आपसी संबंध और भाईचारा भी छीन ले गया। होली का रंग अब हमारे यथार्थ जीवन से भी लुप्त होता जा रहा है। पहले होली के हफ्ते भर पहले कपड़े खरीदने की तैयारी के साथ महिलाएं अपने घर के आंगन और छतों पर पापड़, चिप्स बनाने में जुट जाती थीं। आज लोगों का रंगों के प्रति आकर्षण भी लुप्त हो गया है।
डॉ. कुमार पंकज का मानना है कि आज लोक परंपरा का उल्लंघन हो रहा है। प्रेम ओर माधुर्य की जगह हुड़दंग ने ले लिया है। आज हर पर्व के साथ दिखावा और औपचारिकताएं जुड़ गई हैं। होली शुरू होने से पहले घर की औरतें एकत्र होकर गीत, संगीत और नृत्य का कार्यक्रम किया करती थीं। घरों में टेसू के फूलों से प्रकृतिक रंग बनाया जाता था। हंसी ठिठोली हुआ करती थी। गालियां भी ऐसी जिसे सुनकर हंसी आती थी। चौक-चौराहे पर कवि सम्मेलन हुआ करते थे। पहले जहां दिन में लोग एक-दूसरे के साथ रंग खलते थे तो शाम को इत्र लगाकर होली की बधाई देते थे। अब खतरनाक रसायनिक रंगों का डर रहता है। होली में मेल-मिलाप का रंग नदारद है।