भगवान शिव की प्रिय नगरी काशी। दुनिया का सबसे प्राचीन शहर। राजराजेश्वर स्वरूप में यहीं विराजते हैं श्री काशी विश्वनाथ। द्वादश ज्योर्तिलिंग में प्रमुख स्वर्णमंडित शिखरों से युक्त बाबा के मंदिर में बारहों महीने भक्तों की कतार लगी रहती है। 24 मार्च के जनता कर्फ्यू और कोरोना महामारी ने हालात बदल दिए हैं।
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काशी विश्वनाथ मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में जहां पहले सामान्य दिनों में 30 से 35 हजार भक्त दर्शन-पूजन करते थे, वहीं अब यह आंकड़ा सैकड़े में भी नहीं पहुंच रहा है। बात करें सावन में तो मात्र 50 हजार भक्तों ने ही बाबा के दरबार में हाजिरी लगाई। सावन के सोमवार पर जहां डेढ़ से दो लाख भक्त पहुंचते थे।
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काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में रखा जा रहा सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल।
- फोटो : अमर उजाला।
वहीं इस बार यह संख्या तीन से चार हजार ही रही। हर-हर, बम-बम से गुलजार रहने वाली काशी की गलियों और सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। अनलॉक में भी भक्तों की संख्या गिनती की ही रह गई है। शहर के प्रमुख मंदिरों का भी यही हाल है। हालांकि संकटमोचन, दुर्गामंदिर समेत कई मदिर व शिवालय में आम भक्तों का प्रवेश बंद हैं। जैन समुदाय ने भी पर्युषण पर्व में मंदिरों के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए नहीं खोले।
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काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा के लिए जाते श्रद्धालु
- फोटो : ANI
24 मार्च से कोरोना संक्रमण के कारण बंद हुए काशी विश्वनाथ के कपाट 9 जून को बाबा दरबार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए थे। इस दौरान कुछ शर्तों के साथ ही भक्तों को बाबा दरबार में प्रवेश दिया जा रहा है। श्रद्धालु इस दौरान मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं।
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काशी विश्वनाथ का तिरंगा श्रृंगार
दो हिस्सों में बंटा हुआ है ज्योर्तिलिंग
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो हिस्सों में बंटा हुआ है। दाहिने हिस्से में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजती हैं। वहीं दूसरी तरफ भगवान शिव वाम रूप में विराजमान हैं। माना जाता है कि यहां आकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। विशेष बात ये है कि इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं और ऐसा अद्भुत संयोग दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।