हिंदुओं की सात पवित्र पुरियों में से एक काशी को मंदिरों एवं घाटों का नगर कहा जाता है। ऐसा ही एक मंदिर है काशी विशालाक्षी मंदिर, जिसका वर्णन देवी पुराण में मिलता है। मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी ने बताया कि मीरघाट पर गलियों से गुजरते हुए धर्मेश्वर महादेव के निकट ही मां विशालाक्षी का भव्य मंदिर स्थित है।
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मां विशालाक्षी।
- फोटो : अमर उजाला
विशाल नेत्रों वाली मां विशालाक्षी का यह स्थान मां सती के 51 शक्ति पीठों में से भी एक है। इनका महत्व कांची की मां (कृपा दृष्टा) कामाक्षी और मदुरै की (मत्स्य नेत्री) मीनाक्षी के समान है। शास्त्रों के अनुसार, काशी के कर्ताधर्ता बाबा विश्वनाथ मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करते हैं।
स्कंद पुराण कथा के अनुसार जब ऋषि व्यास को वाराणसी में कोई भी भोजन अर्पण नहीं कर रहा था तब विशालाक्षी एक गृहिणी की भूमिका में प्रकट हुईं और ऋषि व्यास को भोजन दिया। विशालाक्षी की भूमिका बिल्कुल अन्नपूर्णा के समान थी।
इसी स्थान पर गिरी थी मां सती का कर्ण कुंडल और आंख
महंत ने बताया कि मान्यता के अनुसार इस स्थान पर मां सती का कर्ण कुंडल और उनकी आंख गिरी थी। जिससे इस स्थान की महिमा और महात्म्य दोनों काफी बढ़ गए। लोग यहां मां की उपस्थिति मानकर दर्शन-पूजन करने लगे। बाद में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया। जिसमें मां की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में मां विशालाक्षी की दो मूर्तियां हैं।
1971 में अभिषेक कराते समय पुजारी की गलती से मां की मुख्य प्रतिमा की अंगुली खंडित हो गई थी। जिसके बाद खंडित प्रतिमा के आगे मां की दूसरी प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई। देवी विशालाक्षी की पूजा उपासना से सौंदर्य और धन की प्राप्ति होती है। यहां दान, जप और यज्ञ करने पर मुक्ति प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि यदि आप यहां 41 मंगलवार कुमकुम का प्रसाद चढ़ाते हैं तो इससे देवी मां आपकी झोली भर देंगी।