संतकबीरनगर जिले में स्थित ऐतिहासिक तामेश्वरनाथ धाम शिवभक्तों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है। अलौकिक और पौराणिक मान्यताओं को समेटे यह स्थान सामाजिक गतिविधियों का एक उदाहरण भी रहा है। यहां करीब एक माह तक चलने वाले सावन मेले में 45 वर्ष पहले लोगों के शादी के रिश्ते भी पक्के हुआ करते थे। इस मंदिर के देखरेख का जिम्मा यहां रह रहे भारती परिवार संभालते हैं। जो अपनी बारी के हिसाब से मंदिर की देखरेख करने के साथ ही उससे होने वाली आमदनी को खर्च करने के अधिकारी होते हैं।
Sawan 2022: शिवभक्तों की आस्था का केंद्र है तामेश्वरनाथ धाम, 350 साल पहले ऐसे हुआ था निर्माण
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भारती परिवार से ताल्लुक रखने वाले बुजुर्ग बलदेव भारती ने बताया कि मंदिर के गर्भगृह का निर्माण आज से करीब 350 वर्ष पूर्व बांसी के तत्कालीन राजा ने कराया था। उस समय भारती परिवार के पूर्वज सन्यासी टेकधर भारती के जिम्मे मंदिर का देखरेख सौंपा गया था। उन्होने बताया कि तामेश्वरनाथ में रह रहे भारती परिवार मूल रूप से हरनही तहसील के जैसरनाथ भरोहिया के निवासी हैं। गर्भगृह निर्माण के बाद जैसे-जैसे श्रद्धालु यहं आते गए मंदिर निर्माण का कार्य चलता रहा।
आज परिसर में मुख्य शिव मंदिर सहित करीब सोलह छोटे बड़े शिवालय और हनुमान मंदिर भी हैं। हर वर्ष श्रावणमास के महीने भर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पहुंचती है। सावन में एक महीने तक अनवरत यहां मेले का आयोजन होता है। जिसमें लाखों श्रद्धालु शिव जी को जलाभिषेक करते हैं।
महात्मा बुद्ध ने यहीं करवाया था अपना मुंडन संस्कार
लोग बताते हैं कि महात्मा बुद्ध ने अपना मुंडन संस्कार यहीं कराया था। ऐसा उनके पूर्वज बताते थे। मंदिर परिसर में स्थित एक अर्धनारीश्वर मंदिर की आकृति भी बुद्ध कालीन मंदिर की ही तरह बना हुआ है। इस बात की तस्दीक मंदिर पर पहुंची पुरातत्व विभाग की टीम ने भी किया था। आज भी लोग अपने बच्चो का मुंडन संस्कार यहां करवाते हैं।
द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान कुंती ने किया था शिवलिंग की स्थापना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडव अपनी माता कुंती के साथ तामेश्वरनाथ धाम में पहुंचे थे। जहां शिव की आराधना के लिए कुंती ने शिवलिंग की स्थापना की थी। मंदिर से थोड़ी दूर रामपुर में स्थित एक पोखरे का निर्माण भी पांडवों ने कराया था। जो आज द्वापरा के नाम से जाना जाता है। लोगों का ऐसा मानना है कि इस पोखरे का निर्माण द्वापर युग में होने के वजह से इसका नाम द्वापर रहा होगा। पोखरे के निर्माण में प्रयुक्त ईंट भी अपनी ऐतिहासिक स्थिती को बयां करते है।
सावन महीने में बुलंदशहर, नानपारा, बहराइच की खजले की दुकानें और बिहार प्रांत के पटना शहर से आई मिठाई की दुकानों के साथ झूले और मौत का कुंआ लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र रहता है। मेले का लुफ्त उठाने के साथ ही लोग गृह उपयोगी सामान जिनमें लोहे के बर्तन, लकड़ी के सामान, बक्सा, आलमारी आदि की खरीदारी भी करते हैं।