मिशन 2019 के चुनावी समर में उतरी भारतीय जनता पार्टी ने भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण की समय से पहले रिहाई की सौगात देकर वेस्ट यूपी के दलितों पर एक और दांव खेला हैं। भाजपा नेतृत्व को भी अहसास है कि भीम आर्मी चुनाव में समीकरण बिगाड़ सकती है। कैराना उप चुनाव में भीम आर्मी ने भाजपा प्रत्याशी का विरोध कर अपने वजूद का अहसास भी करा दिया था।
सियासी गलियारों में माना जा रहा है कि भाजपा ने रावण पर मेहरबानी कर छिटक रहे दलित वोटों को अपने पाले में लाने की एक और कोशिश की है। चार साल पहले घडकौली में एक बोर्ड को लेकर सुर्खियों में आई भीम आर्मी वैसे तो विशुद्ध अराजनैतिक संगठन था, मगर वक्त के साथ उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पंख लगने शुरू हो गए थे।
रासुका में जेल में बंद रावण को कई राजनीतिक दलों ने अपने साथ जोड़ने की कोशिश की। यहां तक कि उन्हें जेल से चुनाव लड़ने तक की ऑफर दी गई। भीम आर्मी ने जिले में सबसे मजबूत माने जाने वाली बसपा से जरूर अपनी दूरियां बनाए रखी। 2018 में हुए कैराना उप चुनाव में भाजपा के खिलाफ आवाज बुलंद करने के साथ महा गठबंधन प्रत्याशी का साथ दिया।
बाकायदा कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव घूमकर प्रचार भी किया। चुनावी हार के बाद भाजपा में भीम आर्मी के बढ़ते वजूद को लेकर बेचैनी थी। दलित एक्ट में संशोधन कर केन्द्र सरकार ने दलितों को यह बताने का प्रयास किया कि उनसे बड़ा कोई उनका हिमायती नहीं है। योगी सरकार के वक्त से पहले चंद्रशेखर उर्फ रावण की रिहाई के आदेश को चुनावी तैयारियों का हिस्सा माना जा रहा हैं, क्योंकि भीम आर्मी वेस्ट यूपी के अलावा देश के कई हिस्से में अपने सांगठनिक ढांचे को मजबूत करने में कामयाब रही है।
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chandrashekhar ravan
- फोटो : amar ujala
भाजपा को पता है कि यदि भीम आर्मी की उपेक्षा की गई तो वह भी अन्य दलों के साथ खड़ा होकर भाजपा को नुकसान पहुंचा सकती है। फिलहाल रावण की रिहाई से भीम आर्मी कार्यकर्ता उत्साहित है। यह देखना दिलचस्प रहेगा कि मिशन 2019 में भीम आर्मी प्रमुख की रिहाई कराकर कितना लाभ उठा पाती है।