जकार्ता के लिए भारतीय दल की रवानगी से पहले सबसे बड़ा सवाल यही था कि भारत एशियाई खेलों के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को हासिल कर पाएगा या नहीं। लेकिन भारत का प्रदर्शन शानदार रहा। इन खेलों में पश्चिमी यूपी के कई खिलाड़ियों ने इंडोनेशियाई धरती पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। छोटे गांवों और शहरों के इन खिलाड़ियों ने न सिर्फ देश का नाम रोशन किया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेरठ का नाम चमकाया। इन नौजवानों की जीत के पीछे है कठिन परिश्रम और संघर्ष की कहानी जो हर किसी को भावुक कर देती हैं। आइए जानतें हैं मेरठ के ऐसे ही एशियन गेम्स विजेताओं की जीत के सफर के बारे में :-
रवि कुमार ने देश को दिलाया पहला पदक, सर्दी गर्मी जो मौसम हर दिन करते थे प्रैक्टिस
एशियन गेम्स में प्रतिभागी खिलाड़ियों में से मेरठ व आसपास के क्षेत्र से कई खिलाड़ी रहे। मवाना के भैंसा गांव निवासी रवि कुमार और अपूर्वी की जोड़ी ने 10मी. एयल राइफल में देश का पहला पदक कांस्य दिलाकर भारत का खाता खोला। कलीना निवासी 16 साल के शूटर सौरभ चौधरी की इस कामयाबी से देश गदगद हो उठा।रवि ने अपने आंगन में निशानेबाजी करना शुरू किया। धीरे-धीरे उनका निशानेबाजी का यह शौक जुनून में बदल गया, जिसके बाद उन्होंने पहली बार बागपत के जोहड़ी गांव में निशानेबाजी के गुर सीखे। दरअसल, यहां उनके नाना डॉ. राजपाल सिंह की शूटिंग रेंज थी जिसमें रवि ने ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी। सर्दी, गर्मी हो या बरसात वह हर दिन सुबह पांच बजे उठकर प्रैक्टिस के लिए जाते थे। यहां कई घंटे प्रैक्टिस करने के बाद उन्होंन कई शूटिंग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया।यहां तक कि राइफल के लिए भी कई बार रजिस्ट्रेशन किया लेकिन बात नहीं बनी। रवि भारतीय वायुसेना में कार्यरत है और उन्होंने एयरफोर्स की राइफल से ही गोल्ड मेडल जीता।
खिलौनों से खेलने की उम्र में उठाई बंदूक
मोदीपुरम के शार्दूल विहान ने रजत पदक की सौगात देश को दी जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं उस उम्र में मेरठ की क्रांतिधरा से निकले 15 साल डबल ट्रैप शूटर शार्दुल विहान ने एशियन गेम्स में रजत जीतकर देश का मान बढ़ाया है। शार्दुल ने फाइनल के लिए शीर्ष स्थान पर रहते हुए क्वालीफाई किया था। शार्दुल ने बेहद मजबूत शुरुआत की थी, लेकिन 11वें शॉट में उनका निशाना पहली बार चूका। मेरठ का निशानेबाज 2014 में इस खेल से जुड़ा था और एक साल बाद ही स्पर्धाओं में हिस्सा लेने शुरू किया था। वह हर रोज सुबह उठकर दिल्ली जाकर प्रैक्टिस करता था। शार्दुल प्रैक्टिस के लिए जाते समय गाड़ी में ही ब्रेक फास्ट करता था और गाड़ी में ही नींद पूरी करता था। इसके बाद शूटिंग के दौरान लंच करता था। एक दिन में निशाना लगाने में शार्दुल का हर रोज का खर्च करीब 10 हजार रुपये और माह में तीन से सवा तीन लाख रुपये है।
मुश्किलों से जूझकर बहु सीमा ने किया नाम रोशन
चार बार कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करनी वाली सीमा पूनिया ने जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीतकर एक बार फिर से अपना लोहा मनवाया है। सीमा ने 62.26 मीटर डिस्कस थ्रो कर कांस्य पदक पर कब्जा किया। मूलरूप से हरियाणा के सोनीपत के गांव खेवड़ा निवासी सीमा पूनिया मेरठ की बहु हैं। दरअसल की शादी सकौती टांडा में हुई थी। अंकुश पूनिया सीमा के पति और कोच भी हैं। सीमा ने जर्काता में चल रहे एशियन गेम्स में अच्छा प्रदर्शन करते हुए देश के नाम एक और कांस्य पदक कर दिया। सीमा ने 62.26 मीटर डिस्कस थ्रो डालकर यह मेडल जीता है।
कभी पैसों के लिए दिव्या लड़ती थी कुश्ती आज चमकाया देश का नाम
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दिव्या काकरान
- फोटो : अमर उजाला
सीसीएस यूनिवर्सिटी से खेलने वाली मुजफ्फरनगर की पहलवान दिव्या काकरान ने 68 किग्रा में कांस्य पदक झटका। अंतरराष्ट्रीय कुश्ती के फलक पर चमक रही पहलवान दिव्या काकरान ने दृढ़ संकल्प से यह मुकाम हासिल किया है। मुश्किल हालातों में भी उसने खुद के जुनून को जोश से भरे रखा। कभी पैसे के लिए दंगलों में लड़कों को पटखनी देती दिव्या महिला कुश्ती में भारत की नई सनसनी बन गई है। दिल्ली में पहली बार दंगल में कुश्ती जीतने पर उसे केवल 30 रुपये इनाम मिला था।