जिन्हें जीते जी हिंदुओं ने अपनी बिरादरी से अलग कर दिया, वह मरने के बाद धार्मिक संकीर्णता से परे होकर पूजनीय हो गए। उनकी मजार पर हिंदू-मुस्लिम दोनों दीप जलाते हैं। दोनों उनकी मजार की देख रेख करते हैं...
मेरठ में बजाजा बाजार इलाके की एक गली में मजहबों से परे मोहब्बत के चिराग जलते हैं। इसकी पहचान उसी से है। मिट्ठा पीर एक नाम नहीं, इंसानियत की मिठास है। उनके नाम का मंदिर और मजार आमने-सामने हैं।
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मनोज कुमार
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लोग मंदिर में पूजा करते हैं और मजार में दीपक जलाते हैं। मिट्ठा पीर की कहानी को पुरानी पीढ़ी ने अपने कंठों में पाला-पोसा। उनसे होते हुए वह अगली पीढ़ी तक पहुंची। उसने हमें सुनाई। नवाब की दावत में मांस खाने पर बिरादरी से अलग किए गए वैद्य मिट्ठनलाल शर्मा परिवार के साथ यहां चले आए। मौत के बाद उन्हें दफनाया गया। लोगों ने उनकी मजार बना दी। तब से वह पीर मिट्ठा कहलाए और सबके लिए पूजनीय बन गए।
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मोहम्मद सुहैल
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उनके द्वारा स्थापित मंदिर मिट्ठा पीर के नाम से जाना जाता है। लोग मंदिर और मजार दोनों पर अपनी आस्था लुटाते हैं। यह गली पीर मिट्ठा कहलाती है। कुछ कदम चलकर आमने सामने मिट्ठा पीर का मंदिर और मजार हैं। मंदिर में शिवलिंग, हनुमान जी व राधा कृष्ण आदि की मूर्तियां स्थापित हैं। संकरी गली के अंदर जाकर मिट्ठा पीर की मजार है।
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सुनील गुप्ता
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69 वर्षीय अखिलेश शर्मा बताते हैं, अपने दादा जी से पीर मिट्ठा की कहानी सुनी। उनका नाम मिट्ठनलाल शर्मा था। वह गाजियाबाद के वैद्य थे। उन्होंने नवाब का इलाज किया। खुश होकर नवाब ने उन्हें दावत में बुलाया। वहां उन्होंने मांस खा लिया जिसके बाद उन्हें बिरादरी से अलग कर दिया गया। इस बात को पीढ़ियां बीत गईं। उनकी पत्नी ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। मजार बनने के बाद वह मिट्ठा पीर हो गए। पीर साहब हमारे बुजुर्ग हैं। कहते हैं कि मजार पर बीमारी से जुड़ी मनोकामना मांगने पर पूरी हो जाती है।