मेरठ में विक्टोरिया पार्क में 10 अप्रैल 2006 को कंज्यूमर मेला गुलजार था। दिन ढलने लगा था। लोग घरों की तरफ निकलने वाले थे, तभी शाम 5:40 बजे अचानक पंडाल में भीषण आग लग गई। बदहवास लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर दौड़ने लगे। देखते ही देखते करीब 1500 वर्ग मीटर में लगा पंडाल आग के शोलों में बदल गया। लोहे के मजबूत फ्रेम मोम की तरह पिघलकर गिरने लगे। इस भीषण अग्निकांड में 65 जिंदगियां चलीं गईं और 161 लोग गंभीर रूप से झुलस गए।
कराहतीं जिंदगियां: कभी भूल नहीं पाएंगे अपनों का दर्द, खौफनाक था वो मंजर, जिंदा जल गए थे 65 लोग
वह बताती हैं कि अतहर एक निजी शिक्षण संस्थान चलाते थे, वह अपने दोस्त के साथ विक्टोरिया पार्क मेले में गए थे। शाम को पता चला कि उनका एक्सीडेंट हो गया है और वह लोकप्रिय अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें यह नहीं बताया गया था कि वह इस हादसे का शिकार हो गए हैं। अस्पताल पहुंची तो देखा बुरी तरह से जले हुए थे। तीन दिन तक वह यहां भर्ती रहे, इसके बाद उन्हें दिल्ली के अस्पताल में शिफ्ट किया गया, लेकिन 14 अप्रैल 2006 को उन्होंने दम तोड़ दिया। तब दोनों बच्चियां मासूम थीं। छोटी बेटी को कुछ याद नहीं, बड़ी बेटी को थोड़ा याद है। मेरे और परिवार के लिए बहुत बड़ा गम है, जिसे अल्फाजों में बयां नहीं किया जा सकता।
फराह कहती हैं कि विक्टोरिया पार्क अग्निकांड की लड़ाई लड़ रहे लंदन स्पोर्ट्स वाले संजय गुप्ता ने सगे भाई से ज्यादा उनकी मदद की है। अपनी बहन की तरह उनका और उनके परिवार ख्याल रखा है। वह और उनका परिवार संजय गुप्ता का शुक्रगुजार है।
प्रशासन ने नहीं माना, विक्टोरिया पार्क में हुई मालती तायल की मौत
मेरी मां मालती तायल (70) और पिता रमेश चंद्र तायल (75) की जान भी 10 अप्रैल 2006 को विक्टोरिया पार्क अग्निकांड में चली गई थी। पिता की मौत को तो माना, मगर अब तक प्रशासन ने नहीं माना कि माता की मौत भी वहीं हुई थी। यह कहते हुए मनोरंजन पार्क निवासी नरेश तायल की आंखें नम हो जाती हैं। कहते हैं, मां का शव नहीं मिला, शव इस कदर जले हुए थे कि हम मां का शव पहचान नहीं पाए। एक महिला का शव अज्ञात में बचा था, नौ माह तक उसकी पहचान नहीं हुई। मेडिकल जांच में पता चला उसके दांत असली थे, जबकि हमारी माता के दांत नकली थे, इसलिए उस शव को नहीं अपनाया। हालांकि बाद में हमारी संस्था ने ही उस महिला के शव का अंतिम संस्कार किया। शव बदलने के कारण कोई और परिवार माता का शव ले गया था।
पूरा तायल परिवार था पंडाल में
नरेश की पत्नी जया तायल बताती हैं कि वह, पति नरेश, सास मालती, ससुर रमेश चंद्र, दो बेटे अभिषेक और अवनीश छूट पर बेचे जा रहे इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने मेले में गए थे। हम तंबू से बाहर आ गए थे, सास ससुर अभी अंदर थे। हमारी आंखों के सामने, तंबू आग की लपटों में घिर गए।