उत्तर प्रदेश का बेहद चर्चित जिला मेरठ। इसका नाम लेते ही लोगों के जेहन में कई ऐतिहासिक स्थल आने लगते हैं। खास बात यह है कि यहां देश क्या विदेशों से पर्यटक घूमने आते हैं। किसी स्थल का देश की आजादी से गहरा नाता है तो किसी स्थल का बहुत पुराना इतिहास है। आइए आज आपको ऐसे ही पांच स्थलों के बारे में बताते हैं, जिन्हें जानकर शायद आपका मन भी घूमने आने के लिए लालायित हो उठे...
भारत: पांच ऐसे ऐतिहासिक स्थल, जिन्हें देखने विदेशों से आते हैं पर्यटक, ये रही सभी की मान्यता
ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर
1857 की क्रांति का गवाह कैंट स्थित बाबा औघड़नाथ मंदिर पर्यटन का अच्छा स्थान है। इसे कालीपलटन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शंकर का यह मंदिर 1857 की लड़ाई में पैदल सैनिकों की लाइनों में स्थित था। जहां मंदिर के पुजारी ने सिपाहियों को विवादित कारतूसों के प्रयोग के खिलाफ भड़काया था। मंदिर में आज भी शहीद स्तंभ बना है, जहां प्रतिवर्ष 10 मई, शहीद दिवस को श्रृद्धांजलि सभा होती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों की आस्था के प्रमुख केंद्र कालीपलटन मंदिर में सावन महीने मे कांवड़ लेकर भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक करने लाखों की संख्या में आते हैं। खास बात यह है कि यहां विदेशी पर्यटक इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने आते हैं। मान्यता है कि जो भी यहां सच्चे मन से आता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।
हस्तिनापुर
पश्चिमी यूपी के पांच ऐतिहासिक स्थलों में अब बात करते हैं कुरु वंश के राजाओं की राजधानी हस्तिनापुर की। यह स्थान मेरठ शहर से करीब 38 किमी की दूरी पर स्थित है जबकि मेरठ शहर देश की राजधानी दिल्ली से तकरीबन 90 किमी दूर है। कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम् का नायक दुष्यंत यहीं का शासक था।
हस्तिनापुर कुरु जनपद की राजधानी और हस्तिनापुर जैन धर्म की नगरी है। यहां आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का पारणा स्थल है। तीर्थकरों में शांतिनाथ, कुन्थुनाथ व अरहनाथ का जन्म, दीक्षा व कैवल्य ज्ञान भी यहीं हुआ। उल्टा खेड़ा नाम से मशहूर विदुर का टीला भी यहीं है, जिसमें मृदभाण्ड के अलावा मुगलकाल के अवशेष मिलते हैं। यहां जैन मंदिर, प्राचीन पांडेश्वर मंदिर, द्रोपदेश्वर मंदिर व कर्ण मंदिर भी देखने लायक हैं।
यहां स्थित सभी मंदिरों की काफी मान्यता है। बताया जाता है कि 'पांडेश्वर महादेव मंदिर' में पांडवों की रानी द्रौपदी पूजा के लिए जाया करती थी। यहां आज भी श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है।
ऐतिहासिक चर्च
ऐतिहासिक रोमन कैथलिक चर्च को बेगम समरू द्वारा बनवाया गया था। यह ऐतिहासिक चर्च सौहार्द, आस्था और इतिहास का बेजोड़ नमूना है। इस चर्च को ईसाई धर्म के लोग कृपाओं की माता मरियम का तीर्थस्थान मानते हैं। ऐसी मान्यता है कि माता मरियम अपने श्रद्धालुओं पर कृपा बरसाती हैं। मां मरियम के दर्शन करने के लिए यहां देश-विदेशों से पर्यटक आते हैं। इस ऐतिहासिक चर्च के कारण ही सरधना का नाम अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमकता है।
ये है चर्च का इतिहास
बेगम समरू के द्वारा बनवाए गए इस चर्च को पोप जॉन 23वें ने 1961 में माइनर बसिलिका का दर्जा दिया था। बताना जरूरी होगा कि ऐतिहासिक और भव्य गिरिजाघरों को ही यह दर्जा प्राप्त होता है। बड़ी बात यह है कि इस चर्च को बनने में करीब 11 वर्षों का समय लगा था। इस चर्च के निर्माण का कार्य वर्ष 1809 में शुरू हुआ था। इस ऐतिहासिक चर्च के खास दरवाजे पर इमारत के बनने का वर्ष 1822 दशार्या गया है। इस चर्च के निर्माण में कई सौ लोग समेत कलाकार भी लगे थे। यहां हर वर्ष नवंबर माह के दूसरे शनिवार-रविवार को मेले का आयोजन होता है। जबकि 25 दिसंबर को लोग मां मरियम के दर्शन करने आते हैं।
लाक्षागृह
महाभारत काल में दुर्योधन द्वारा बनवाया गया लाक्षागृह बागपत में स्थित है। 'वारणावत' नाम का यह स्थान उन गांवों में से एक है, जिसकी मांग पांडव कौरवों से कर रहे थे। लेकिन दुर्योधन ने उन्हें सुई की नोक के बराबर जमीन नहीं देने की बात कही थी। दुर्योधन ने एक साजिश के तहत इस लाक्षागृह को बनवाया था, ताकि पांडव जब इस घर में रहने आएं तो चुपके से इसमें आग लगा कर उन्हें खत्म किया जा सके। लेकिन दुर्योधन की यह साजिश सफल नहीं हुई और पांडव इस भवन से सकुशल बच निकले थे।