उत्तर प्रदेश की तीर्थनगरी मथुरा में होली उत्सव जारी है। बुधवार को नंदगांव में होली खेली गई। 'फगुवा दै मोहन मतवारे, आजु भोर ही नंदपौर ब्रजवासिन कीच मचाई, बरसाने की गोपी फगुवा मांगन आईं, कियौ जुहार नंद जू कौं भीतर भवन बुलाईं' आदि पदों के तानों से नंदभवन गूंज रहा था। टेसू के सुगंधित फूलों से बनाया गया प्राकृतिक रंग नंदभवन में मौजूद हर किसी के तन-मन को अपने रंग में रंग रहा था।
Mathura Holi: बरसाना से नंदगांव पहुंचे हुरियारे, सुगंधित फूलों से बने रंग से रंगा तन-मन, घर-घर गूंजे मंगलगीत
द्वापर में जब फागुन सुदी नवमी को भगवान श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ होली के बाद बिना कोई फगुवा (उपहार) दिए बरसाना से नंदगांव आ गए थे तो बरसाना में सभी गोप-गोपियों ने बैठक की। बैठक में निर्णय लिया गया कि फगुवा लेने के लिए नंदगांव नंदभवन चलना चाहिए। अगले दिन दशमी को बरसाना के गोपी ग्वाल जुर मिल कर फगुवा लेने के लिए नंदभवन आते हैं। यहां द्वार पर खडे होकर कहती हैं फगुवा दै मोहन मतवारे फगुवा दै। फगुवा के बहाने एक बार फिर नंद के गांव में होली होती है। फाग महोत्सव की इसी लीला को साकार करने के लिए बरसाना के बाद नंदगांव में लठामार होली का आयोजन बुधवार को किया गया।
बुधवार की दोपहर करीब दो बजे से ही बरसाना से राधारानी सखी स्वरूप बरसाना से हुरियारों का आगमन शुरू हो गया है। यशोदा कुंड पर चकाचक रबडी, केसर युक्त भांग ठंडाई छानी गई। नंदगांव के लोगों द्वारा भव्य स्वागत सत्कार किया है। जैसा कि पहले से अंदेशा था कि लाठियां बरसने वाली हैं तो इसके लिए सिर पर पगड़ी बांधी गई। कुंड से बाहर निकलकर एकत्रित हो ढालों को उपर करते हुए नंद के जमाई की जय से गगनभेदी जयघोष करते हुए भूरे का थोक से नंदभवन की ओर हुरियारे कूच कर रहे हैं।
भूरे का थोक में गुलाब की पंखुडियों से जोरदार स्वागत किया गया। जगह जगह फूलों से रंगोली सजाई गई। छतों से सैंकडों ड्रमों में पहले से तैयार किया गया टेसू के फूलों का प्राकृतिक रंग हुरियारों पर बरसाया जा रहा था। हर कोई अद्वितीय प्रेम के इस रंग में सराबोर होने के लिए मचल रहा था। हुरियारों के झुंड के झुंड हुरियारिनों से इशारा कर कर के कह रहे हैं कि दर्शन दै निकस अटा में ते दर्शन दै। लहंगा चुन्नी और सोलह श्रृंगारों से सजी धजी हुरियारिनें अपने घर के द्वार, अटा अटरियाओं के झरोखों से झांकने लगीं। भंग की तरंग में मदमस्त हुरियारे हंसी ठिठोली करते हुए नंदभवन पहुंचे।
नंदभवन में पहुंचते ही पहले से ताक में बैठे नंदगांव के ग्वालों ने बरसाना के हुरियारों पर पिचकारी, बाल्टियों से टेसू के फूलों के रंग से उनको सराबोर कर दिया। चारों ओर नंदभवन में विभिन्न रंगों की सतरंगी छटा छा गई। नंदगांव बरसाना के समाजियों ने कृष्ण-बलराम के विग्रहों के सामने संयुक्त समाज गायन किया। तमाम परम्परागत रीति-रिवाजों के बाद शुरू होती है विश्व प्रसिद्ध लठामार होली। शाम के करीब साढ़े पांच बजे रंगीली चौक पर हजारों की संख्या में हुरियारे और हुरियारिन जमा हुए।
इसके बाद वे नृत्य व गायन प्रस्तुत करते हैं। चंदा छिपमत जईयौ आज, श्याम संग होरी खेलुंगी, नैनन में मोहे गारी दई पिचकारी दई होरी खेली न जाय। इस तरह के तमाम लोकगीतों पर हुरियारे और हुरियारिन नृत्य करते कन्हैंया की अलौकिक लीला में मगन हो जाते हैं। संध्या को समाजियों का आदेश हो जाने पर प्रेम भरी लाठियों की बरसात शुरू हो जाती है। बीच-बीच में वहां पर मौजूद अन्य भक्तों पर भी प्रेम पगी लाठियां दुलार दिखाती रहीं। लोग छतों से यह नजारा देख लालायित हो रहे थे।
नंदगांव की लठामार होली का महत्व
कृष्णकाल में भगवान श्री कृष्ण फागुन सुदी नवमी को होली खेलने बरसाना गए और बिना फगुवा (नेग )दिए ही वापस लौट आए। बरसाना की गोपियों ने कन्हैंया से होली का फगुवा लेने के लिए नंदगांव जाने की सोची। इसके लिए राधाजी ने बरसाना की सभी सखियों को एकत्रित किया और बताया कि कन्हैंया बिना फगुवा दिए ही लौट गए हैं। हमें नंदगांव चलकर उनसे फगुवा लेना है। बस फिर क्या, अगले दिन ही यानि दसमी को बरसाना की ब्रजगोपियां होली का फगुवा लेने नंदगांव आती हैं। इस लीला से जुडे पदों का नंदभवन समाज में गायन होता है।
दसमी दिन आ बरसाने हुरियारिन आ नंदगांम सजीं समकीलि
कल कौ बदलौ अज देंय चुकाय बराबर हो कह गोरी रसीली
रस रंग मिलै फगवा हू मिलै बन गोपन भेष बना गरबीली
बरसानियां इत नंदगांम समाज जुरयौ नंद भौन मनाय रंगीली