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जानिए बोस की 'आजाद हिंद फौज' और फौज की महिला कैप्टन लक्ष्मी सहगल के बारे में
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 23 Jan 2018 02:48 PM IST
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आजाद हिंद फौज
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'आजाद हिंद सरकार' की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनाई गई थी। लेकिन इस लेख में जिसे 'आजाद हिन्द फौज' कहा गया है उससे इस सेना का कोई सम्बन्ध नहीं है। हां, नाम और उद्देश्य दोनों के ही समान थे। रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित करीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था और उसे भी यही नाम दिया यानी 'आजाद हिन्द फौज'। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आजाद हिन्द फौज का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी।
आजाद हिंद फौज
बोस ने आंदोलन की रणनीति और वैचारिक आयामों में खुद को ज्यादा खपाया। उत्तर भारत से कुछ चुनिंदा सम्मेलनों को छोड़ दूर ही रहे। ऐसा क्यों हुआ होगा, इसकी पूरी कथा। है फिलहाल यह स्मरण कर गर्व करते हैं कि वह चार बार कानपुर की धरती पर आये और लोकप्रियता में गांधी-नेहरू से कमतर नहीं रहे । नेता जी पहली बार 1934 में बस कुछ समय के लिए कानपुर में रुके जब वे एक कार्यक्रम में लखनऊ जा रहे थे। तबियत खराब हुई तो रास्ते से डॉ जवाहरलाल रोहतगी उन्हें अपने घर ले आये।
सुभाष चंद्र बोस
वह रात्रि विश्राम के बाद सुबह लखनऊ रवाना हो गए। दूसरी बार 27 अक्टूबर 1939 को आये। इस समय वे कांग्रेस से अलगाव के रास्ते पर थे। दूसरा विश्व युद्ध छिड़ चुका था जिसके विरुद्ध फारवर्ड ब्लॉक ने पूरे देश में आंदोलन छेड़ रखा था। इसी सिलसिले में जनसमर्थन जुटाने नेता जी कानपुर आये। उन्होंने मजदूरों की एक बड़ी सभा की तथा उनके सम्मान में एक बड़ा भोज भी आयोजित हुआ।
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सुभाष चंद्र बोस की जयंती
थोड़े ही समय बाद 1 जनवरी 1940 को फिर कानपुर आये। सुभाष आदर्श पुस्तकालय में कार्यकर्ताओं की सभा की। चौथी और अंतिम बार 7 अप्रैल 1940 को आये। कांग्रेस से रास्ते जुदा हो चुके थे। एक बड़ी जनसभा में उन्होंने कांग्रेस के दक्षिणपंथ और साम्प्रदायिकता पर जम कर हमला बोला।
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सुभाष चंद्र बोस की जयंती
नवंबर 1945 में INA सैन्य कमांडरों पर दिल्ली में मुकदमा और नेता जी की संभावित मृत्यु से पूरा देश उबल रहा था ; कानपुर भी अछूता नहीं रहा। अनेकों हड़ताल और शोक सभाएं हुई जिन्हें आयोजित करने में मौलाना हसरत मोहानी , डॉ मुरारी लाल , बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' आदि प्रमुख़ थे। गोबिंद बल्लभ पन्त भी एक सभा को संबोधित करने आये। पूरे नवम्बर कानपुर आंदोलित रहा ।