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कानपुरः निकाह को बेताब चार बेटियों ने अपने पिता के खिलाफ दर्ज कराया घरेलू हिंसा का मुकदमा

Mon, 08 Apr 2019 05:15 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, कानपुर
आशुतोष मिश्र, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Mon, 08 Apr 2019 05:15 PM IST
सार



 

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daughter lodges fir against father for marriage
फाइल फोटो
कानपुर में एक अनोखा मामला सामने आया है। कानपुर के यशोदा नगर मछरिया निवासी चार बेटियों ने पिता के खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दाखिल किया है। कहा, पिता का दायित्व है कि वह उनका निकाह कराए। गुजारा भत्ता के रूप में प्रतिमाह 20 हजार रुपये दिलाया जाए। काउंसलिंग के बाद जिला प्रोबेशन अधिकारी को दिए बयानों में चारों बहनें अपनी बात पर अडिग हैं।




 
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तीन तलाक
न्यायालय ने इन चारों युवतियों की काउंसलिंग कर समझौते के लिए मामला जिला प्रोबेशन अधिकारी के पास भेजा। 25, 23, 21 और 18 साल की इन चारों बहनों ने जिला प्रोबेशन अधिकारी को एक सप्ताह पहले अपने बयान दर्ज कराए हैं। इसमें कहा है कि उनके पिता ने मां को 2015 में तलाक दे दिया था। इसके बाद मारपीट कर घर से निकाल दिया था।

 
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फाइल फाेटो - फोटो : PTI
वह पिता के साथ रहती हैं। उनमें से एक बहन का तलाक हो गया था इसलिए वह भी साथ में रहती है। पिता अक्सर चारों को मारपीट कर रुपये कमाकर देने को कहता है। शराब के नशे में मारपीट करने पर आठ दिसंबर 2018 को नौबस्ता थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट दर्ज कराने के बाद पिता और क्रूर व्यवहार करने लगा। पिता पॉवरलूम ऑपरेटर है।

 
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फाइल फोटो - फोटो : PTI
इससे 30 हजार रुपये प्रति माह कमाता है। फेथफुलगंज के मकान का 15 हजार रुपये किराया भी आता है। इसलिए उन चारों बहनों को 20 हजार रुपये गुजारा भत्ता दिलाया जाए। चारों बहनें विवाह योग्य हैं। इसलिए पिता पर उनके निकाह की नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 को 26 अक्तूबर 2006 में लागू किया गया था।

 
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फ़ाइल फ़ोटो - फोटो : amar ujala
इसके तहत हर जिले में संरक्षण अधिकारी की नियुक्ति भी की गई है। यह अधिकारी पीड़ित को कानूनी मदद दिलाते हुए शिकायत मजिस्ट्रेट के सामने पेश करता है। पीड़ित की मदद के लिए एक काउंसलर भी मिलता है। अधिवक्ता शिवाकांत दीक्षित का कहना है कि इस अधिनियम के तहत क्षतिपूर्ति दिलाने का प्रावधान है। किसी तरह की कोई सजा का प्रावधान नहीं है। सेक्शन 20 में चिकित्सा, खर्च दिलाने, बच्चों की फीस दिलाने और अन्य प्रकार के मुआवजे का प्रावधान है। सेक्शन 22 में मानसिक और भावनात्मक संकट पर प्रतिकर दिलाया जाता है।
 
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