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चुनावी दौर में बैंक, बाजार और एटीएम से गायब होने लगे 2000 के नोट, होश उड़ा देगा ये खेल

Fri, 10 May 2019 01:36 AM IST
शिखा पांडेय प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Fri, 10 May 2019 01:36 AM IST
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2000 notes are missing in a large number in daily transaction
फाइल फोटो
लोकसभा चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल को रोकने का दावा भले किया जा रहा हो लेकिन एक सच ये भी है कि चुनावी दौर में 2000 के नोटों की जमाखोरी पहले से अधिक बढ़ी है। इसका असर बैंकों की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।  
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कानपुर के कई करेंसी चेस्ट में 2000 के नोट नाम मात्र बचे हैं। यानी करेंसी न तो रिजर्व बैंक के पास है न ही पब्लिक बैंकों के पास। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही करीब एक साल से नोटों की जमाखोरी चल रही है। इसका असर अब बैंकों पर दिखने लगा है।
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फाइल फोटो
कानपुर में करेंसी चेस्ट की बैलेंसशीट बताती है कि 2000 रुपये के नोटों की संख्या कुल रकम की औसतन 20 फीसदी शेष है। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जारी कुल करेंसी में 2000 रुपये के नोटों का हिस्सा 50 फीसदी से अधिक है। 

2000 notes are missing in a large number in daily transaction
फाइल फोटो
बैंकों के सूत्र बताते हैं कि 2000 के नोट बैंक, बाजार और एटीएम से लगातार कम होते जा रहे हैं। इनकी जगह पर 500, 200 के नोटों का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है। 2000 के 80 फीसदी नोट लोगों की तिजोरियों में कैद हैं।

इन्हें अघोषित रूप से बड़े लेनदेन में इस्तेमाल किया जा रहा है। सिर्फ कानपुर में ही चुनाव में पकड़ी गई करीब चार करोड़ रुपये की नकदी इसका सबूत है। जो नहीं पकड़ी जा पा रही वो कालेधन के तौर पर इस्तेमाल हो रही है।
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फाइल फोटो
इस तरह घटे 2000 के नोट
नोटबंदी के छह माह बाद यानी अप्रैल से जून 2017 तक बैंकों में कैश की आवक में 2000 रुपये के नोटों की संख्या 35 से 40 फीसदी रहती थी। नवंबर 2017 में यह घटकर 20 से 25 फीसदी ही रह गई। 2000 रुपये के नोट वापस आने की स्थिति लगातार ऐसी ही बनी रही। मार्च 2018 में यह आवक 18 से 20 फीसदी थी। इसके बाद से 2000 रुपये के नोटों की आवक एकदम थम गई। अब औसत चार से पांच फीसदी नोट ही वापस आ रहे हैं। अब हालात गंभीर हो चले हैं। 

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फाइल फोटो
जमाखोरी रोकने में रिजर्व बैंक नाकाम  
रिजर्व बैंक 2000 रुपये के नोटों की जमाखोरी रोकने में नाकाम रहा है। रिजर्व बैंक की अगस्त 2018 में आई एक रिपोर्ट केंद्र सरकार को भी कटघरे में खड़ा करती है। रिपोर्ट का आकलन करने पर पता चलता है कि जिस मकसद से नोटबंदी का फैसला लिया गया, वह पूरी तरह सफल नहीं रहा। सबसे बड़ी नाकामी तो करेंसी की जमाखोरी को लेकर है। नोटबंदी के बाद भी करेंसी की जमाखोरी नहीं रुकी। यह स्थिति कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए नाकाफी है। डिजिटल लेनदेन बढ़ने के बजाय कैश में लेनदेन का चलन फिर से शुरू हो गया है। 
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