कुंभ नगरी में देश-दुनिया के तमाम जगहों से आए संतों का निराला संसार देखने को मिल रहा है। इससे ज्यादा अनोखा है उनके माथे पर अलग-अलग रंग और आकार में लगा तिलक। आदि शंकराचार्य की स्थापित की हुई सनातन संंस्कृति जितनी पुरानी है, माथे पर तिलक लगाने की परंपरा भी तभी से चली आ रही है। हर संप्रदाय से जुड़े संन्यासियों के माथे का तिलक भी अलग होता है। इसका साक्षात दर्शन कुंभ में किया जा सकता है।
कुंभ मेला 2019: अलबेले संतों के माथे पर निराले तिलक, इससे होती है उनके अराध्य देव की पहचान
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तिलक राम का पूजन शिव का
वैष्णव और शैव संप्रदाय के लोगो के देवताऔं और तिलक में अजीब से विरोधाभास है। शैव लोग अपना आराध्य देव शिव को मानते हैं, लेकिन अपने माथे पर जो तिलक लगाते हैं, वह राम के धनुष के आकार की तरह होता है। इसी तरह वैष्णव संप्रदाय के लोग अपना आराध्य श्रीराम, श्रीकृष्ण और विष्णु को मानते हैं लेकिन इनके माथे पर जो तिलक होता है उसका आकार शिव के त्रिशूल की तरह होता है। रामानुजाचार्य हंसदेवाचार्य ने बताया कि तिलक की परंपरा सनातन से चली आ रही है। शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि राम ने शिव की आराधना की थी और शिव ने राम की। यही वजह है कि दोनों संप्रदायों के आराध्य भले अलग हो लेकिन तिलक से वे एक हो जाते हैं।
तिलक के यह भी रंग
संंन्यासी लोग भस्म का तिलक लगाते हैं,
सामान्य संत चंदन और मलयागिरी का तिलक लगाते हैँ
तिलक शत, रज और तम तीनों का प्रतीक माना जाता है।