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प्रयागराज में मोरारी बापू की कथा में पहुंचे कुमार विश्वास की कविताओं पर हुए लोटपोट

Sun, 01 Mar 2020 10:33 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 01 Mar 2020 10:33 PM IST
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Reaching the story of Morari Bapu in Prayagraj, Kumar loses on the poems of faith
prayagraj news - फोटो : prayagraj

मोरारी बापू की कथा में दिन में भक्ति की बयार बही तो शाम को राष्ट्रीय मुद्दों समस्याओं से लेकर समाज से जुड़े पहलुओं से जुड़ी हास्य-व्यंग्य की कविताओं पर लोग हंसते-हंसते लोटपोट हुए। कवि कुमार विश्वास ने दिल्ली हिंसा पर आधारित अपनी कविताओं और गीतों से वाहवाही बटोरी।

Reaching the story of Morari Bapu in Prayagraj, Kumar loses on the poems of faith
prayagraj news - फोटो : prayagraj

शाम 5:30 बजे संत मोरारी बापू की मौजूदगी में कवि सम्मेलन की शुरुआत हुई। कवि कुमार विश्वास को सुनने के लिए पंडाल भीड़ से खचाखच भरा हुआ था। उन्होंने शुरुआत सीएए पर प्रदर्शनों व दिल्ली में हुई हिंसा को आधार बनाकर की। बापू की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने पंक्तियां पढ़ीं कि- अब बापू को और कथाएं सुनानी होंगी/ ज्यादा प्रवचन करने होंगे/ तब जाकर धरती पर रक्त कम होगा...।

Reaching the story of Morari Bapu in Prayagraj, Kumar loses on the poems of faith
prayagraj news - फोटो : prayagraj

इसके बाद उन्होंने गंगा पर अपने गीत से सबका ध्यान खींचा। पंक्तियां इस तरह थीं- यह गंगा का किनारा है...ये जिंदगी के आखिरी पल का सहारा है...। इसके तहत खिलौने साथ बचपन तक/ जवानी बस रवानी तक/ सभी अनुभव भरे किस्से/ बुढ़ापे की कहानी तक...। इसके अलावा उन्होंने प्रेम भावना, भाईचारा, देशप्रेम पर आधारित कविताएं भी पढ़ीं।

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Reaching the story of Morari Bapu in Prayagraj, Kumar loses on the poems of faith
prayagraj news - फोटो : prayagraj

इससे पहले कवि सम्मेलन की शुरुआत गौरी मिश्रा वाणी वंदना से की। फिर, गौरी ने शृंगार रस की कविताओं से सराबोर कर दिया। न मैं डर से निकलती हूं/ न मैं भय से निकलती हूं/ जो है संगीत लहरों में उसी लय से निकलती हूं...। इनके बाद हास्य कवि किरण जोशी ने माइक संभाला। कवि जोशी की कविताओं में भारतीय संस्कृति, समभाव, भाईचारा के भाव झलक रहे थे।

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prayagraj news - फोटो : prayagraj
उनकी पंक्तियां इस तरह थीं- अब हद हो गई बस/ घर -घर में घुस गए सीरियल...। जितने चाहे धरम बदलेंगे/ भगवान नहीं बदलेंगे। जितने चाहे कफन बदल दो/ शमशान नहीं बदलेंगे । संचालन कर रहे बुद्धि प्रकाश दाधीच ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को लोटपोट कर दिया। बुद्धि प्रकाश ने अंतरिक्ष में पुन: चढ़ाई... कविता सुनाकर तालियां बटोरीं।
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