कुंभ मेले की शुरुआत में अब कुछ ही दिन शेष बचे है। इस बार कुंभ 15 जनवरी से लेकर 4 मार्च तक चलेगा। पूरे 50 दिन तक चलने वाले इस अर्द्धकुंभ की क्या मान्यता है और सिर्फ प्रयागराज और हरिद्वार में ही क्यों अर्द्धकुंभ का मनाया जाता है। इसके पीछे हमारे पुराणों में कुछ मान्यताएं हैं। आगे की स्लाइड में पढ़ें...
पुराणों में ऐसा वर्णन है कि समुद्र मंथन के बाद निकले अमृत कलश को पाने के लिए देवों और दैत्यों में युद्ध हु़आ था। यह युद्ध 12 दिनों तक चला था। देवों के बारह दिन मनुष्यों के 12 वर्ष के बराबर होते हैं। इस प्रकार देवताओं का एक दिन मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है। बारह दिनों तक युद्ध चलने के कारण ही बारह वर्ष पर कुंभ पर्व का आयोजन किया जाता है। इसे पूर्ण कुंभ के नाम से जाना जाता हैं।
जिन चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उनमें हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन शामिल हैं। इन्हीं चार जगरों पर कुंभ का आयोजन होता है, लेकिन अर्द्धकुंभ का आयोजन सिर्फ हरिद्वार और प्रयागराज में होता है। टीकरमाफी आश्रम के संस्थापक स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी जी महाराज के अनुसार छह वर्षों में हरिद्वार तथा प्रयाग में कुंभ का कुछ योग बनता है लेकिन वह पूरा योग नहीं होता है। इसलिए इसको अर्द्धकुंभ कहते हैं। इसमें संपूर्ण देवताओं को आगमन नहीं होता है। अर्द्धकुंभ में सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की ही प्रधानता होती है। अन्य देवता इसमें शामिल नहीं होते हैं। ऐसा मत्स्यपुराण में कहा गया है।
वृष राशि पर बृहस्पति का योग होने पर प्रयागराज में पूर्ण कुंभ का अयोजन किया जाता है। स्कंदपुराण में कहा गया है कि- मकरे च दिवानाथे वृषगे च बृहस्पतौ। कुंभ योगो भवेत्तत्र प्रयागे ह्यति दुर्लभ:॥ अर्थात वृषराशि में बृहस्पति हों और जिस दिन सूर्यनारायण मकर राशि में प्रवेश करते हों, उस योग को कुंभ योग कहते हैं। ऐसा योग प्रयाग के लिए अति दुर्लभ होता है।
अन्यत्र भी कहा गया है- माघे वृषगते जीवे मकरे चंद्र भास्करौ। अमायां च ततो योग: कुंभाख्य तीर्थ नायके। अर्थात उस माघ मास में अमावस्या के दिन बृहस्पति वृष राशि में हों, सूर्य तथा चंद्र मकर राशि में हों, तब-तब प्रयागराज में कुंभ पर्व होता है। शास्त्रों में कहा गया है- प्रयागे माघ मासे तु त्र्यहं स्नानस्य यद्भवेत। नाश्वमेध सहस्रेण तत्फलं लभते भुवि। पुराणों में कहा गया है कि- अश्वमेध सहस्राणि वाजपेयशतानि च। लक्षं प्रदक्षिणा भूमे: कुंभ स्नाने तत्फलं। हजार अश्वमेध यज्ञ करने और लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो फल मिलता है, वही फल मनुष्य को कुंभ पर्व के स्नान से प्राप्त होता है।