लॉकडाउन के तीन दिनों बाद से ही शहर के साथ ग्रामीण इलाकों में मलेरिया में इस्तेमाल होने वाली क्लोरोक्वीन, बुखार में इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामॉल सहित दर्द, एलर्जी, एंटीबायोटिक दवाओं की किल्लत शुरू हो गई है। वाहनों के आवागमन पर रोक के कारण दवा के फुटकर और थोक कारोबारी कंपनियों से दवाएं नहीं ला पा रहे हैं। कुछ दवा कारोबारियों ने जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें दवाओं को लाने की अनुमति दी जाए।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : social media
मार्च और अप्रैल के महीने में मौसम के करवट बदलने पर जुकाम, बुखार, खांसी, सांस फूलना, एलर्जी होना जैसी बीमारियां अपना रंग दिखा रहीं हैं। बड़ी संख्या में लोग वायरल की चपेट में हैं। वे डॉक्टर को दिखाना चाह रहे हैं लेकिन कोरोना के संक्रमण के चलते बाहर निकलना मुश्किल हो गया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल द्विवेदी कहते हैं कि दो दिनों से बुखार में इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामॉल, एंटीबायोटिक दवाएं जैसे-एजिथ्रोमायसिन, सिप्रोफ्लाक्सासिन, सेवजिन, ओफ्लाक्सासिन, ओफ्लाक्सासिन विथ सेवरजिन, बच्चों को दी जाने वाली निमोस्लाइड विथ पैरासिटामाल, एंटी एलर्जिक दवाएं जैसे- मोंटिल्यूकॉस विथ लियोसट्रिजिन, मोंटिल्यूकॉस विथ फैक्सोफेनारिन आदि की किल्लत देखने को मिली है। थोक कारोबारियों के पास तो थोड़ा बहुत स्टाक मिल जाएगा लेकिन, फुटकर कारोबारियों के पास इन दवाओं की किल्लत होने लगी है। दुकानों पर पहुंचने वाले ज्यादातर लोग इन्हीं दवाओं की मांग कर रहे हैं।
उधर, दवा के फुटकर कारोबारी एवं प्रयाग केमिस्ट एवं ड्रगिस्ट एसोसिएशन के महामंत्री लालू मित्तल कहते हैं कि अभी तो कुछ दुकानों पर ये दवाएं मिल जा रही हैं लेकिन आने वाले चार से पांच दिनों में इन दवाओं का मिलना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने बताया कि दो दिनों से लगातार जिला प्रशासन से पास निर्गत किए जाने की मांग की जा रही है।
इसके अलावा लॉकडाउन को देखते हुए ब्लडप्रेशर, हृदय, मस्तिष्क, सांस और डायलिसिस वाले मरीज जिनकी दवाएं नियमित चल रही हैं, वे भी महीने या 15 दिन की लेने की बजाय दो-दो, तीन-तीन महीने की दवाएं ले रहे हैं। उधर, कोरोना के उपचार में इस्तेमाल के लिए क्लोरोक्वीन की स्वीकृति स्वास्थ्य परिवार कल्याण से मिलने के बाद इसकी डिमांड अचानक से बढ़ गई है। लोग बिना चिकित्सकीय सलाह के दो-दो पत्ते खरीद रहे हैं।