कुंभ मेले में शंभूपंच दशनाम आवाहन अखाड़े की ओर से तकरीबन डेढ़ हजार महापुरुषों को संन्यास दीक्षा दी गई। गंगा किनारे जुटे महापुरुषों संग तकरीबन पचास साध्वियों ने भी खुद के लिए सत्रहवां पिंडदान किया। यह नागा संन्यासियों के लिए संन्यास दीक्षा थी। पिंडदान दीक्षा के बाद साध्वियां संन्यासिनी बन गईं।
संस्कार और अनुष्ठान के दौरान अखाड़े के कोतवालों ने धर्मदंड लेकर व्यवस्था संभाली। महिलाओं की संन्यास दीक्षा की जगह पर अखाड़े से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित रहा। संन्यास दीक्षा की प्रक्रिया के तहत सबसे पहले सभी का मुंडन संस्कार कराया गया। फिर गंगा स्नान, भस्म स्नान, गोमूूत्र, गाय के गोबर, पंचगव्य, पंचामृत स्नान के बाद फिर गंगा स्नान कराने के बाद श्वेत वस्त्र दिए गए।
महापुरुषों और साध्वियों दोनों को परंपरानुसार पलाश का दंड और कुल्हड़ का कमंडल दिया गया। काशी के पुरोहित रामनिवास पाठक के आचार्यत्व में पिंडदान के बाद सभी ने पिंडों को गंगा में विसर्जित किया। आधी रात के बाद आवाहन पीठाधीश्वर आचार्य महांडलेश्वर स्वामी शिवेंद्र पुरी जी महाराज की देखरेख में अखाड़े की छावनी में विजयाहवन संस्कार किया गया।
इससे पहले अग्नि के समक्ष ओम नम:शिवाय का जाप भोर तक जारी रहा। इन महापुरुषों में संन्यासी बने श्रीमहंत मनमोहन गिरि के शिष्य देवेंद्र गिरि भी शामिल थे, जिन्होंने आजीवन पैदल चलने के साथ ही भिक्षाटन करके भोजन का संकल्प लिया है।
अखाड़े के महासचिव श्रीमहंत सत्यगिरि जी महाराज की देखरेख और राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रीमहंत मनमोहन गिरि के संचालन में हुए अनुष्ठान में संरक्षक श्रीमहंत नीलकंठ गिरि, श्रीमहंत अवधूत गिरि, श्रीमहंत अमरीश भारती, श्रीमहंत रसराज पुरी, श्रीमहंत सोमगिरि, श्रीमहंत कैलाशपुरी, श्रीमहंत प्रयागभारती सहित बड़ी संख्या संत, संन्यासी, श्रद्धालु मौजूद थे।