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ताजनगरी की पच्चीकारी को लगी 'नजर', 'वारिस' के इंतजार में पच्चीकार
Sat, 15 Jun 2019 11:48 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Sat, 15 Jun 2019 11:48 AM IST
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पच्चीकारी दिखाते पच्चीकार विष्णु शंकर
- फोटो : अमर उजाला
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दुनियाभर में मशहूर ताजनगरी की पच्चीकारी को नजर लग गई है। आज की पीढ़ी की इस काम को आगे बढ़ाने की मंशा नहीं है। उन्हें लगने लगा है कि इस काम में अब उतनी कमाई नहीं रही, जितनी पहले थी। पच्चीकारी के काम में मुनाफा आधे से भी कम रह गया है। बड़े-बड़े कारखानों से लेकर छोटी दुकानों तक कारीगरों की संख्या काफी कम हो चुकी है।
पच्चीकारी करते पच्चीकार (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
गोकुलपुरा में कई दुकानदार तो बिना कारीगर के ही काम चला रहे हैं। वहीं, बड़े कारखानों में पच्चीकारों की संख्या बीस प्रतिशत तक रह गई है। इंग्लैंड, अमेरिका आदि देशों से पच्चीकारी के काम का ऑर्डर मिलना भी काफी कम हो चुका है। बड़े इनले एक्सपोर्टर्स का मानना है कि पच्चीकारी के जिन कारखानों में 100 कारीगर काम करते थे, उन कारीगरों की संख्या भी 20-25 रह गई है।
ताजनगरी की मशहूर पच्चीकारी
- फोटो : अमर उजाला
कई कारखानों में जहां तीन-चार पीढ़ियों से यह काम चल रहा था, अब अगली पीढ़ी उस काम को नहीं कर रही है। ताजगंज, नाई की मंडी, गोकुलपुरा में पच्चीकारी के काम के लगभग सौ से अधिक कारखाने और तीन सौ से अधिक दुकानें हैं। कई घरों में पीढ़ियों से चल रहे इस काम को आने वाली पीढ़ी अब बेमन से संभाल रही है।
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पुरस्कार लेने आगरा के पच्चीकार (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
पच्चीकारी के काम में पांच साल में जिस तरह की गिरावट आई है, उससे यह लगने लगा है कि इस काम को चलाना अब मुश्किल है। पांच साल पहले सालाना कारोबार लगभग दो करोड़ का था, वह अब घटकर लगभग अस्सी लाख रुपये सालाना का रह गया है। इकबाल एंड कंपनी के संचालक इकबाल अहमद का कहना है कि इस कारोबार में पहले ही काफी गिरावट आ चुकी है। ऊपर से जीएसटी की मार ने कारोबार को काफी प्रभावित किया है। तीन पीढ़ी पहले शुरू किए गए इस काम को अब आने वाली पीढ़ी नहीं करना चाहती।
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पच्चीकारी के कारीगर
- फोटो : अमर उजाला
गोकुलपुरा में छोटे दुकानदार पच्चीकारी के काम में लगातार आ रही गिरावट से काफी दुखी हैं। रामचंद्र लाल के संचालक विष्णु शंकर का कहना है कि तीन पीढ़ियों से उनके यहां यह काम चल रहा है। अब पूरी तरह से काम पिट चुका है। यही कारण है कि बेटा नीरज कुमार सिंह इस काम को नहीं कर रहे। वह प्राइवेट जॉब कर रहे हैं। विष्णु शंकर का कहना है कि इस काम से घर के खर्चे तक नहीं निकल रहे।