गुजरात के पालनपुर से 1229 कामगारों को लेकर स्पेशल ट्रेन सोमवार को आगरा कैंट स्टेशन पहुंची। यहां उनकी थर्मल स्क्रीनिंग की गई। इनमें आगरा के 44 श्रमिक शामिल हैं, जबकि अन्य श्रमिक प्रदेश के विभिन्न जिलों से हैं। ट्रेन से उतरने के बाद श्रमिकों के चेहरे पर सुकून नजर आया। 41 दिन के बाद उनको घर की राह दिखाई दी। उनका कहना था कि सरकार ने उनकी सुन ली। इस मुश्किल समय में वो कम से कम अपने घर में दिन बिता सकेंगे।
2 of 6
आगरा कैंट स्टेशन पर की गई थर्मल स्क्रीनिंग
- फोटो : अमर उजाला
श्रमिक स्पेशल ट्रेन शाम 6.30 बजे आगरा कैंट स्टेशन पहुंची। 24 कोच में 1229 कामगार अपने परिवारों के साथ स्टेशन पर उतरे। इनमें अयोध्या, कानपुर देहात, मैनपुरी, गोरखपुर, औरेया, फर्रुखाबाद, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सहारनपुर समेत कई जिलों के लोग शामिल हैं। रेलवे अधिकारियों ने एक-एक कोच से श्रमिकों को निकाला, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग (सामाजिक दूरी) का पालन हो सके। इसके बाद थर्मल स्क्रीनिंग करके बाहर आए तो उन्हें ले जाने के लिए रोडवेज की बसें खड़ी हुई थीं। यह देखकर कई श्रमिकों की आंखें भर आईं।
3 of 6
स्टेशन के बाहर खड़ी रोडवेज बसें
- फोटो : अमर उजाला
श्रमिकों का कहना था कि सरकार को पहले ही लोगों को घर भिजवा देना चाहिए था। एक महीने के बाद भी फंसे रहने के कारण उनकी जमा पूंजी तक खत्म हो गई। अब गांव जाने के बाद कोई कामधंधा भी नहीं कर सकेंगे। पालनपुर इंडस्ट्रियल एरिया में काम करने वाले श्रमिकों का कहना था कि अभी अगले दो माह तक वहां फैक्टरियों में ठीक से काम शुरू नहीं हो पाएगा। इतने लंबे समय तक वहां कैसे रहा जा सकता था। रोडवेज की 65 बसों से इन मजदूरों को उनके गृह जिलों में भेजा गया।
बहुत सह लिया इन दिनों में
4 of 6
श्रमिक स्पेशल ट्रेन में बैठे लोग
- फोटो : अमर उजाला
औरेया के रामसूरत ने बताया कि फैक्टरी बंद होने के बाद एक महीने का वेतन तो मिल गया, लेकिन अप्रैल में कुछ नहीं मिला। ऐसे में पूरे परिवार का पेट पालना मुश्किल हो गया। हमने सोचा था कि जाकर बेटी के हाथ पीले करेंगे मगर अब शादी भी टालनी पड़ेगी। किसी तरह घर पहुंच जाएं, यही बहुत है। 41 दिनों में बहुत सह लिया।
5 of 6
गुजराज से श्रमिक स्पेशल ट्रेन में आए लोग
- फोटो : अमर उजाला
एडवांस भी नहीं दिया, पड़े खाने के लाले
इटावा के मोहनलाल ने बताया कि माता-पिता गांव में बीमार रहते हैं। जब लॉकडाउन हुआ तो लगा था कि आठ दस दिन में सब ठीक हो जाएगा, लेकिन परेशानियां कम होने की जगह बढ़ गई। फैक्टरी वाले ने एडवांस देने से मना कर दिया। रोटी के लिए लाले पड़ गए। अब अपने गांव में जाकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर लेंगे।