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सावन 2019: मुगल काल के पहले से लग रही ताजनगरी की परिक्रमा, महामना ने दिया था भव्य रूप

Mon, 29 Jul 2019 11:32 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Mon, 29 Jul 2019 11:32 AM IST
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sawan 2019 history of shiv temples parikrama in agra
सावन में परिक्रमा करने उमड़े भक्त - फोटो : अमर उजाला
सावन में दूसरे सोमवार को लगाई जाने वाली ताजनगरी की परिक्रमा का इतिहास मुगलकाल से भी पुराना है। शुरुआत में कम ही लोग परिक्रमा करते थे, लेकिन धीरे धीरे भोलों की संख्या बढ़ती गई और यह भव्य होती चली गई। जानिए कैसे शुरू हुई सावन में परिक्रमा की परंपरा...
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ताजनगरी में परिक्रमा करते भक्त - फोटो : अमर उजाला
इतिहासकार सुगम आनंद बताते हैं कि मुगलों के आने से पहले राजपूतों के काल में परिक्रमा शुरू हुई। शहर के चारों कोनों पर शिव मंदिर हैं, इसलिए सावन के पावन दिनों में लोगों ने चारों मंदिरों में अभिषेक के लिए परिक्रमा शुरू की। 
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शिवालयों में उमड़े परिक्रमार्थी - फोटो : अमर उजाला
अकबर के जमाने में राजा मान सिंह ने इसे प्रश्रय दिया। इसके बाद मराठा काल में जब कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया गया, तब परिक्रमा ने गति पकड़ी। इसके बाद परिक्रमा में कुछ व्यवधान भी आए। 1940 में महामना मदन मोहन मालवीय शहर में आए थे। उन्होंने परिक्रमा को भव्य रूप में फिर से शुरू कराया।
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भगवान शिव पर जलाभिषेक करने के लिए कांवड़ लेकर आते शिवभक्त - फोटो : अमर उजाला
मन:कामेश्वर मंदिर के महंत योगेश पुरी ने बताया कि वर्ष 1800 में ताजनगरी के आसपास महामारी फैली थी। इस दौरान लोग अपने अपने गांव के देवता को याद करने लगे। शहरवासियों ने शहर की परिक्रमा कर महामारी से बचाने के लिए भोलेबाबा से प्रार्थना की। इसके बाद सावन माह के दूसरे सोमवार को शहर की परिक्रमा की जाने लगी। 
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परिक्रमा मार्ग पर भक्तों की भीड़ - फोटो : अमर उजाला
पहले विवाहित व्यक्ति ही परिक्रमा किया करते थे, क्योंकि परिक्रमा रात में दी जाती थी। इसलिए महिलाएं सुबह खाना बनाकर बल्केश्वर महादेव मंदिर पर पहुंचती थीं। जहां उनके पति परिक्रमा कर आते थे। पत्नियां उनकी सेवा करने के साथ भोजन कराती थीं।
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