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बरसाना में राधा-कृष्ण के प्रेम का प्रतीक है यह पर्वत, यहां मोर रूप धारण कर नाचे थे भगवान

Fri, 06 Sep 2019 12:21 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा Published by: मुकेश कुमार Updated Fri, 06 Sep 2019 12:21 AM IST
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radha krishna mayor leela at morkutir barsana in mathura
ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित प्राचीन मोरकुटी स्थल - फोटो : अमर उजाला
नाचत श्याम मोरन संग मुदित ही श्याम रिहझावत, ऐसी कोकिला अलावत पपैया देत स्वर ऐसो मेघ गरज मृदंग बजावत... स्वामी हरिदास का यह पद श्याम सुंदर की मयूर लीला को दर्शाता है। मथुरा के बरसाना में ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित प्राचीन मोरकुटी स्थल है, जहां आज भी श्यामसुंदर मोर रूप में विचरण करते हैं। 
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मोर कुटी बरसाना - फोटो : अमर उजाला
इस प्राचीन स्थल का प्राकट्य आज से साढ़े पांच सौ वर्ष पहले श्रील नारायण भट्ट जी ने किया था। जानकारों की माने तो पहले यहां सिर्फ रास चबूतरा था। इसके बाद जयपुर नरेश माधो सिंह ने उक्त चबूतरा पर एक कमरा बनवाया था। लेकिन आज प्राचीन स्थल पर एक भव्य मंदिर बना हुआ है। जहां आज भी राधाकृष्ण के मयूर चित्र की पूजा अर्चना होती है। 
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मोरकुटी में राधाकृष्ण की पेटिंग - फोटो : अमर उजाला
मान्यता है कि एक बार राधारानी मोर देखने के लिए मोरकुटी पर पहुंची, लेकिन वहां एक भी मोर न दिखने पर वो मायूस हो गईं। वृषभान नन्दनी को मायूस देख खुद भगवान श्रीकृष्ण मोर का रुप धारण कर नृत्य करते है। इस दौरान मोर को नाचता देख राधारानी उसे लड्डू खिलाती हैं तो तभी उनकी सखियां पहचान जाती है कि खुद श्याम सुंदर मयूर बन के आयौ है, कहती हैं राधा ने बुलायो कान्हा मोर बन आयो।
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ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित प्राचीन मोरकुटी स्थल - फोटो : अमर उजाला
प्राचीन मोरकुटी स्थल पर कई संतों ने तपस्या की। वहीं राधा बल्लभ सम्प्रदाय के भक्त कवि नागरी दास ने भी इस प्राचीन स्थल पर तपस्या की थी। ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित मोरकुटी स्थल पर जाने के लिए चार रास्ते है। एक जयपुर मंदिर मार्ग, सकंरी खोर, चिकसोली तथा गहवरवन के रास्ते से भी जाया जा सकता है। 
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राधा अष्टमी पर भव्य रूप से सजा लाडली जी की मंदिर - फोटो : अमर उजाला
स्थानीय निवासी मास्टर राम सिंह छोंकर ने बताया कि मोरकुटी एक ऐसा प्राचीन स्थल है जहां आज भी राधाकृष्ण के मौजूद रहने के साक्ष्य दिखाई देते हैं। लेकिन सरकार के अनदेखी के चलते उक्त स्थल सिर्फ नाम के ही लिए मोरकुटी रह गया है। लोगों का मानना है कि मोर कुटी पर भगवान कृष्ण आज भी मोर बनकर नाचते हैं।
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