ब्रज में राधा-कृष्ण के पावन प्रेम की प्रतीक लठामार होली की बात ही निराली है। होली पर राधारानी के गांव बरसाना और श्रीकृष्ण के नंदगांव में रंगों के साथ प्रेमपगी लाठियां भी बरसती हैं। नंदगांव के हुरियारे अपनी ढाल पर बड़ी आसानी के साथ लाठियों की बरसात को नाचते-गाते सह लेते हैं। हुरियारों की ढालों को बरसाना का एक परिवार पिछले 150 वर्षों से तैयार करता चला आ रहा है।
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लठामार होली: ब्रज में रंगों के साथ बरसती हैं हुरियारिनों की लाठियां, हुरियारे ढाल से करते हैं बचाव
Fri, 19 Mar 2021 01:59 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बरसाना (मथुरा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बरसाना (मथुरा)
Published by: मुकेश कुमार
Updated Fri, 19 Mar 2021 01:59 PM IST
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लठामार होली (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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मथुरा में ढाल बनाते कारीगर
- फोटो : अमर उजाला
बहुत मजबूत होती है ढाल
ढाल की कीमत दो से चार हजार रुपये तक है। इसकी मांग पूरे ब्रज में है। इसमें अब चमड़े का प्रयोग नहीं होता है। ट्रक के खराब टायर से बनती है। ढाल के सबसे नीचे लकड़ी के हत्थे में दो स्प्रिंग और ढाल के बीच में स्कूटर के ट्यूब में हवा भर दी जाती है। इससे लाठी पड़ने पर चोट नहीं पहुंचती है। हवा वाली ढाल, लाइट वाली ढाल और एक सामान्य ढाल बनती है।
ढाल की कीमत दो से चार हजार रुपये तक है। इसकी मांग पूरे ब्रज में है। इसमें अब चमड़े का प्रयोग नहीं होता है। ट्रक के खराब टायर से बनती है। ढाल के सबसे नीचे लकड़ी के हत्थे में दो स्प्रिंग और ढाल के बीच में स्कूटर के ट्यूब में हवा भर दी जाती है। इससे लाठी पड़ने पर चोट नहीं पहुंचती है। हवा वाली ढाल, लाइट वाली ढाल और एक सामान्य ढाल बनती है।
लठामार होली के लिए बनी ढाल दिखाता कारीगर
- फोटो : अमर उजाला
ब्रज ही नहीं दूर-दूर से आते हैं लोग
बरसाना के ढाल निर्माता रमेश सैनी ने बताया कि हमारा परिवार पिछले 150 साल से ढाल बनाने का काम कर रहा है। ढाल में पक्की रबर, लकड़ी और लोहे का कुछ सामान प्रयोग में लाया जाता है। होली आते ही ब्रज ही नहीं दूर-दूर से लोग ढाल लेने आते हैं। पुरानी ढालों को भी कुछ लोग ठीक कराते हैं।
बरसाना के ढाल निर्माता रमेश सैनी ने बताया कि हमारा परिवार पिछले 150 साल से ढाल बनाने का काम कर रहा है। ढाल में पक्की रबर, लकड़ी और लोहे का कुछ सामान प्रयोग में लाया जाता है। होली आते ही ब्रज ही नहीं दूर-दूर से लोग ढाल लेने आते हैं। पुरानी ढालों को भी कुछ लोग ठीक कराते हैं।
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लठामार होली (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
खूब होती है हंसी-ठिठोली
लठामार होली के बाद हुरियारे और हुरियारिनों के बीच खून हंसी ठिठोली होती है। नंदगांव के हुरियारे ब्रज बोली में हुरियारिनों से हंसी ठिठोली करते हैं। इसका जवाब हुरियारिनें लाठियां चलाकर देती हैं। हुरियारे ढाल से बचाव करते हैं।
लठामार होली के बाद हुरियारे और हुरियारिनों के बीच खून हंसी ठिठोली होती है। नंदगांव के हुरियारे ब्रज बोली में हुरियारिनों से हंसी ठिठोली करते हैं। इसका जवाब हुरियारिनें लाठियां चलाकर देती हैं। हुरियारे ढाल से बचाव करते हैं।
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बरसाना की लठामार होली (फाइल)
- फोटो : Amar Ujala
बरसाना की हुरियारिन इंदु गौड़ ने कहा कि विश्व प्रसिद्ध लठामार होली राधा-कृष्ण के प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। इस लठामार होली को खेलने के लिए हम एक साल से इंतजार करते हैं। छह महीने पहले से ही घी दूध- बादाम आदि का हम सेवन करते हैं, जिससे लाठी चलाते समय थकान महसूस न करें।