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कभी चोबा, अगरू व अरगजा से महकती थी ब्रज की होली, रसायनयुक्त रंगों में गुम हुए प्राकृतिक रंग
Sat, 15 Feb 2020 12:29 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा-वृंदावन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा-वृंदावन
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 15 Feb 2020 12:29 PM IST
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श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर होली का उत्सव (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
कभी ब्रज में ठाकुर जी के साथ खेले जाने वाली होली के रंगों में चोबा, अगरू, अरगजा, कुमकुमा और टेसू के फूलों की सुगंध से मंदिर परिसर महकते थे, लेकिन बदलते समय के साथ ब्रज की होली में इन प्राकृतिक रंगों की महक अब कम होती जा रही है। फूलों से बने प्राकृतिक रगों की जगह रसायनयुक्त रंगों का चलन बढ़ा है, जो हमारे शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक हैं।
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श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर होली का उत्सव (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
ब्रज की होली का आकर्षण देश ही नहीं दुनिया में देखने को मिलता है। ब्रज की होली की यह ख्याति सदियों से है। स्वर्ग बैकुंठ में होरी जो नांहि, तो कहा करैं लै कोरी ठकुराई...किशनगढ़ रियासत के महाराज नागरीदास का यह पद ब्रज की होली के इस प्राचीन वैभव को दर्शाता है। यहां वसंत पंचमी से ही होली का उत्सव शुरू हो चुका है।
बरसाना के श्रीजी मंदिर में उड़ता रंग गुलाल (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
वर्तमान में ब्रज के मंदिरों में होली से जुड़ी पद-पदावलियों का गायन किया जा रहा है। इसमें ब्रज की प्राचीन पारंपरिक होली से जुड़ा परिदृश्य देखता है। मंदिरों में गाई जा रही होली की धमार और पदावलियों में होली के पुराने रंग चोबा, चंदन, अगरू, अरगजा एवं कुमकुमा का गायन हो रहा है। लेकिन अब होली के परिदृष्य से ये प्राकृतिक रंग सिर्फ गायन तक ही सिमट कर रह गए हैं। मंदिरों में होली के रंगों में ये अब नजर नहीं आते हैं। अब सिर्फ कुछ मंदिरों में टेसू के फूलों का रंग भले ही इस परंपरा को निभाए हुए हैं।
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वृंदावन शोध संस्थान
- फोटो : अमर उजाला
बहुत जटिल है इन रंगों को तैयार करने की प्रक्रिया
वृंदावन शोध संस्थान के शोध एवं प्रकाशन अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि 16वीं सदी में अबुल फजल ने फारसी में इस प्रविधि का अभिलेखीकरण कर इसे यथार्थ के धरातल पर उतारा था। चोबा बनाने में एक सप्ताह का समय लगता था। एक सेर अगरू की लकड़ी, चावल की भुसी, साफ मिट्टी और कपास के मिश्रण से वाष्पीकरण द्वारा 2 से 15 तौला तक चोबा प्राप्त होता था। अरगजा बनाने के लिए मेद, चोबा, बनफशा, गेहला, गुलाब, चंदन तथा कपूर प्रयुक्त होते थे। होली पर इनके उपयोग के दौरान महक आसपास के वातावरण को भी महका देती थी।
वृंदावन शोध संस्थान के शोध एवं प्रकाशन अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया कि 16वीं सदी में अबुल फजल ने फारसी में इस प्रविधि का अभिलेखीकरण कर इसे यथार्थ के धरातल पर उतारा था। चोबा बनाने में एक सप्ताह का समय लगता था। एक सेर अगरू की लकड़ी, चावल की भुसी, साफ मिट्टी और कपास के मिश्रण से वाष्पीकरण द्वारा 2 से 15 तौला तक चोबा प्राप्त होता था। अरगजा बनाने के लिए मेद, चोबा, बनफशा, गेहला, गुलाब, चंदन तथा कपूर प्रयुक्त होते थे। होली पर इनके उपयोग के दौरान महक आसपास के वातावरण को भी महका देती थी।
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बांकेबिहारी मंदिर में होली का उत्सव (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
16वीं सदी से गाए जा रहे पदों में मिलता है इन रंगों का उल्लेख
वृंदावन ब्राह्मण महासभा के संरक्षक सुरेश चंद्र शर्मा ने कहा कि 16वीं सदी के बाद से आज तक मंदिर संस्कृति में जिसने भी श्यामा-श्याम की होली गायी और लिखी है, उसकी बात इन प्राकृतिक रंगों की महक के बगैर पूरी न हुई। सूरदास ने लिखा है हरि संग खेलन फाग चली, चोबा चंदन अगरू अरगजा छिरकत नगर गली...।
वृंदावन ब्राह्मण महासभा के संरक्षक सुरेश चंद्र शर्मा ने कहा कि 16वीं सदी के बाद से आज तक मंदिर संस्कृति में जिसने भी श्यामा-श्याम की होली गायी और लिखी है, उसकी बात इन प्राकृतिक रंगों की महक के बगैर पूरी न हुई। सूरदास ने लिखा है हरि संग खेलन फाग चली, चोबा चंदन अगरू अरगजा छिरकत नगर गली...।