कान्हा के ब्रज में प्रवासी पक्षियों का बसेरा, अठखेलियों से गुलजार हुआ जोधपुर झाल
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अक्तूबर माह में पक्षियों से जुड़ी कई संस्थाओं ने पक्षियों की कई नयी प्रजातियों की पहचान की है। गणना के आकड़े बहुत ही उत्साहित करने वाले हैं। सरकार अगर मथुरा के विभिन्न वेट लैंड (आर्द्र भूमि) का संरक्षण करे तो यहां ईको टूरिज्म की अपार संभावनाएं बन सकती हैं। मथुरा का वन्य क्षेत्रफल एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) द्वारा निर्धारित स्तर से बहुत कम है। जिले के कुल क्षेत्रफल के 33 प्रतिशत के मुकाबले केवल 1.6 प्रतिशत ही जंगल का क्षेत्रफल है। ऐसे में वन्य क्षेत्र एवं जीवों का संरक्षण एक बड़ी चुनौती भी है।
जैव विविधता के संरक्षण एवं अध्ययन करने वाली संस्था बायो डायवर्सिटी रिसर्च एंड डवलपमेंट सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. केपी सिंह ने बताया कि मथुरा में प्रवासी और आवासीय पक्षियों की 250 से अधिक प्रजातियां दिखती हैं। इनमें संकटग्रस्त सूची में शामिल दुर्लभ प्रजातियां भी शामिल हैं। मथुरा में मुख्य रूप से कॉटन पिग्मी गूज, टफ्टेड डक, पोचार्ड (छोटी लालसरी), केंटिश प्लोवर, यूरेसियन कर्ल्यू, ब्लैक टेल्ड गॉडविट, बूटेड ईगल, कॉमन चिफचैफ, यूरोपियन स्टर्लिंग, रोजी स्टर्लिंग, जैसे प्रवासी पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियां मथुरा में देखी जा रही हैं।
इसके अतिरिक्त पक्षियों की गणना के आंकड़ों के अनुसार वेगटेल की पांच, पिपिट की चार, हैरोन की चार, ईग्रिट की चार, बैबलर की चार, वीबर की तीन, कोर्मोरेन्ट की दो, फ्लेमिंगो की दो, बी ईटर की दो, स्टर्लिंग की चार, क्रेन की दो, श्राइक की तीन, स्टॉर्क की चार, स्वैलो की तीन, आउल की चार, मुनिया की तीन, किंगफिशर की तीन, प्रीनिया की चार, बुलबुल की तीन पैराकीट की तीन, आइबिस की तीन, की तीन प्रजातियां मथुरा जिले में देखने को मिली हैं।