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अपराजिता: जमाने ने दिए ताने, महिला खिलाड़ियों ने कामयाबी का शिखर छूकर दिया जवाब, पढ़ें इनकी सफलता की कहानी
Wed, 12 Aug 2020 02:26 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 12 Aug 2020 02:26 PM IST
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दिक्कतों के बीच निखरी अंतराष्ट्रीय खिलाड़ी
- फोटो : अमर उजाला
ताजनगरी की बेटियों ने खेल की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक नाम कमाया है। यह सफर संघर्ष से भरा रहा। जमाने ने ताने दिए लेकिन वे रुकीं नहीं। ध्यान सिर्फ खेल पर दिया। जमाने के तानों का जवाब कामयाबी का शिखर छूकर दिया। जब वह कामयाब हो गईं वे लोग भी प्रशंसक हो गए जो पहले उनके खेलने पर ही एतराज उठाते थे। इन खिलाड़ियों का कहना है कि सफलता का मंत्र सिर्फ यही है कि ध्यान को बंटने मत दो। लोग क्या कहते हैं, यह मत सोचो, फोकस इस पर रखो कि तुम्हें क्या और कैसे करना है।
क्रिकेटर पूनम यादव
- फोटो : अमर उजाला
इंडियन वुमेंस क्रिकेट टीम की सदस्य ईदगाह कॉलोनी निवासी पूनम यादव ने बताया कि शुरुआती दौर में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा। लड़कियों के लिए अलग से न क्रिकेट कोच थे, न ही एकेडमी। इसलिए लड़कों के साथ ही प्रैक्टिस करनी होती थी। इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति कर दी। मुझे प्रैक्टिस बंद करनी पड़ी, आंखों से आंसू तक आ गए। तब मां मुन्नी देवी ने क्रिकेट के लिए मेरे जुनून को पहचाना। उन्होंने मेरे भाई की ड्यूटी लगा दी मुझे प्रैक्टिस के लिए ले जाने और लाने की। भाई तीन से चार घंटे की प्रैक्टिस के दौरान स्टेडियम में ही रहता था। इसके बाद जिला स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक आगे बढ़ती गई।
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शूटर सोनिया शर्मा
- फोटो : अमर उजाला
लोगों ने ताने दिए, पापा ने हौसला
अंतरराष्ट्रीय शूटर बल्केश्वर निवासी सोनिया शर्मा ने बताया कि वह आज जो कुछ हैं, पापा की वजह से हैं। एक लड़की के लिए शूटर बनना आसान नहीं था। मैंने कदम बढ़ाए तो पापा ने रास्ता दिखाया। लोग पापा से कहते कि यह लड़की है, इसे पढ़ाओ, कुछ और काम कराओ। कई ने तो इतना तक कहा कि निशानेबाजी लड़कियों का खेल ही नहीं है। मैं हताश हो गई थी, सोचती थी कि क्या लड़की होना अपराध है, लेकिन पापा मुझे प्रोत्साहित करते रहे। मुझे मेडल मिलने शुरू हुई, लोगों की जुबान बंद हो गई। मैं यही कहूंगी कि लड़कियां अगर खेल के मैदान में जाएं तो दुनिया की बातों पर ध्यान ही न दें।
अंतरराष्ट्रीय शूटर बल्केश्वर निवासी सोनिया शर्मा ने बताया कि वह आज जो कुछ हैं, पापा की वजह से हैं। एक लड़की के लिए शूटर बनना आसान नहीं था। मैंने कदम बढ़ाए तो पापा ने रास्ता दिखाया। लोग पापा से कहते कि यह लड़की है, इसे पढ़ाओ, कुछ और काम कराओ। कई ने तो इतना तक कहा कि निशानेबाजी लड़कियों का खेल ही नहीं है। मैं हताश हो गई थी, सोचती थी कि क्या लड़की होना अपराध है, लेकिन पापा मुझे प्रोत्साहित करते रहे। मुझे मेडल मिलने शुरू हुई, लोगों की जुबान बंद हो गई। मैं यही कहूंगी कि लड़कियां अगर खेल के मैदान में जाएं तो दुनिया की बातों पर ध्यान ही न दें।
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क्रिकेटर दीप्ति शर्मा
- फोटो : अमर उजाला
अपनी आलोचना को प्रशंसा में बदल दिया
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सदस्य मारुति एस्टेट निवासी दीप्ति शर्मा का करियर भी संघर्ष से भरा रहा है। उन्होंने बताया कि शुरू में आलोचना होती थी, इसलिए नहीं कि मैं कैसा खेलती हूं, बल्कि इसलिए कि मैं खेलती ही क्यों हूं, क्योंकि यह तो लड़कों का खेल है। मेरा एक ही मंत्र रहा कि जो लोग आलोचना कर रहे हैं, उन्हें जुबान से नहीं, अपने काम से जवाब दो। जब टीम इंडिया में मेरा चयन हुआ तो बधाई देने वालों में वे लोग भी थे जो कभी आलोचना करते थे।
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सदस्य मारुति एस्टेट निवासी दीप्ति शर्मा का करियर भी संघर्ष से भरा रहा है। उन्होंने बताया कि शुरू में आलोचना होती थी, इसलिए नहीं कि मैं कैसा खेलती हूं, बल्कि इसलिए कि मैं खेलती ही क्यों हूं, क्योंकि यह तो लड़कों का खेल है। मेरा एक ही मंत्र रहा कि जो लोग आलोचना कर रहे हैं, उन्हें जुबान से नहीं, अपने काम से जवाब दो। जब टीम इंडिया में मेरा चयन हुआ तो बधाई देने वालों में वे लोग भी थे जो कभी आलोचना करते थे।
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जिला बैडमिंटन चैंपियन राधा ठाकुर
- फोटो : अमर उजाला
परिवार ने दिया साथ खुद को किया साबित
बैडमिंटन में सात बार की जिला चैंपियन रह चुकीं सदर निवासी राधा ठाकुर बताया कि खेल को करियर के रूप में चुनना आसान नहीं था। एक तो मैं बहुत पैसे वाले परिवार से नहीं हूं। दूसरा, लोग कहते थे कि अगर करना ही है तो ऐसा काम करो जिससे परिवार की सहायता कर सको। इन सबके बीच मुझे बैडमिंटन को करियर बनाना था। मैंने जमाने की परवाह नहीं की। परिवार ने साथ दिया, जब जिला बैडमिंटन चैंपियन बनी तो लोगों ने कहा कि बेटी तुमने खुद को साबित कर दिया।
बैडमिंटन में सात बार की जिला चैंपियन रह चुकीं सदर निवासी राधा ठाकुर बताया कि खेल को करियर के रूप में चुनना आसान नहीं था। एक तो मैं बहुत पैसे वाले परिवार से नहीं हूं। दूसरा, लोग कहते थे कि अगर करना ही है तो ऐसा काम करो जिससे परिवार की सहायता कर सको। इन सबके बीच मुझे बैडमिंटन को करियर बनाना था। मैंने जमाने की परवाह नहीं की। परिवार ने साथ दिया, जब जिला बैडमिंटन चैंपियन बनी तो लोगों ने कहा कि बेटी तुमने खुद को साबित कर दिया।