ताजनगरी में वायु प्रदूषण बेकाबू है। आगरा में हर दिन 14.5 टन पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) घातक सूक्ष्म कणों का उत्सर्जन हो रहा है। इसमें 63 फीसदी धूल कण सड़कों की खोदाई से ही हवा में घुल रहे हैं। तमाम कागजी कवायद के बावजूद प्रदेश के सर्वाधिक प्रदूषित 10 शहरों में शुमार आगरा में हालात नहीं सुधर रहे। ये खुलासा इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी कंजरवेशन (आईआईईसी) की जिला प्रशासन को भेजी गई रिपोर्ट से हुआ है।
एक्सक्लूसिव: ताजनगरी में वायु प्रदूषण बेकाबू, सड़कों की खोदाई से निकल रहे घातक धूल कण
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नवंबर-दिसंबर 2020 में आईआईईसी टीम ने पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ आगरा में वायु प्रदूषण, उत्सर्जन व कारणों पर अध्ययन किया। जिलाधिकारी प्रभु एन सिंह को दस जनवरी को इसकी रिपोर्ट भेजी है। इसमें वायु प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह शहर में बेतरतीब सड़कों की खोदाई बताई है।
धूल नियंत्रण के पर्याप्त उपाय न होने के कारण 63 फीसदी पीएम-2.5 कण सड़कों की खोदाई से हवा में घुल रहे हैं। ये सांस लेने पर नाक-मुंह से फेफड़ों में पहुंचते हैं और फिर गंभीर रूप से बीमार करते हैं। शहर के पर्यावरण में 24 घंटे में 14.5 टन ‘जहर’ घुल रहा है। यानी हर घंटे 604 किलोग्राम। टीटीजेड की सीमाओं पर चल रहे ईंट भट्ठों के धुएं से प्रति दिन तीन टन पीएम-2.5 उत्सर्जन होता है। जो कुल उत्सर्जन का 18 फीसदी है।
- 63 % सड़क की धूल
- 11 % वाहनों का धुआं
- 11 % औद्योगिक इकाइयों से
- 06 % रसोई व घरेलू कार्य
- 05 % होटल व रेस्टोरेंट से
- 02 % शहर के कचरे से
- 01% बिल्डिंग निर्माण
- 01% अन्य वजह
- फाउंड्री उद्योग में सल्फर उत्सर्जन घटाने के लिए अनुपात तय हो।
- होटल व व्यावसायिक भवनों में सिर्फ सीएनजी जेनरेटर इस्तेमाल हों।
- पेठा इकाइयां सीएनजी व पीएनजी गैस से संचालित हों।
- शहर में 30 फीसदी इलेक्ट्रिक वाहन चलने चाहिए।
- टीटीजेड में सिर्फ बीएस-6 वाहन ही पंजीकृत किए जाएं।
- टीटीजेड में सिर्फ बीएस-6 वाहनों का ईंधन इस्तेमाल किया जाए।