हनुमान जयंती आज: राजस्थान के पांच प्रसिद्ध हनुमान दरबार, जानिए इनसे जुड़े रहस्य, कहानियां और चमत्कार
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2. श्री मेहंदीपुर बालाजी महाराज मंदिर, दौसा
- दौसा जिले में सिकंदरा के पास स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर की मान्यता भी पूरे भारत और विदेशों तक फैली हुई है। मेहंदीपुर में हनुमानजी का बालक यानी बाल रूप है। इसी वजह से भी मंदिर को बालाजी भी कहते हैं।
- धार्मिक मान्यता है कि मेहंदीपुर बालाजी में भूत, प्रेत, पिशाच, ऊपरी बाधाएं लोगों के शरीर से उतारे जाते हैं।
- मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में ही प्रेतराज सरकार का भी मंदिर है।
- इस मंदिर में सामान्य भक्तों के दर्शनों के साथ ही ऊपरी बाधाओं और बीमारियों वाले भक्तों की बालाजी के दरबार में पेशी लगती है। अलग से पेशी के लड्डू का प्रसाद भी चढ़ता है।
पौराणिक कथा
पहले मंदिर का क्षेत्र घना जंगल हुआ करता था। जहां श्री महंत जी के पूर्वज बालाजी की पूजा करने लगे थे। श्री महंत जी के सपने में तीनों प्रमुख देवता आए और उन्हें मंदिर बनवाने का आदेश दिया। तब मेहंदीपुर बालाजी की स्थापना हुई।
3. श्री खोले के हनुमानजी मंदिर, जयपुर।
- जयपुर में दिल्ली रोड पर अरावली की पहाड़ियों के बीच श्री खोले के हनुमान जी का मंदिर है। इस मंदिर में स्थानीय लोगों के अलावा देशी-विदेशी पर्यटक भी प्राकृतिक वातावरण में विराजे हनुमानजी के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं।
- खोले के हनुमान जी मंदिर को मनोकामना पूर्ण करने, निसंतान को संतान सुख देने, शारीरिक कष्ट दूर करने वाला, वाद-विवाद से छुटकारा दिलाने के लिए जाना जाता है।
- 1960 के दशक में जयपुर शहर की पूर्वी पहाड़ियों की गुफा में बहते बरसाती नाले और पहाड़ों के बीच निर्जन स्थान में जंगली जानवरों के डर से शहरवासी यहां पहुंच भी नहीं पाते थे।
- खोले के हनुमान मंदिर में श्रीराम दरबार में भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की मूर्तियां हैं। अन्नकूट के अवसर पर यहां लक्खी मेला भरता है।
पौराणिक कथा
- एक साहसी ब्राह्मण पंडित राधेलाल चौबे ने इस निर्जन स्थान में पहाड़ पर लेटे हुए हनुमानजी की विशाल मूर्ति को खोज निकाला। ब्राह्मण ने इसी स्थान पर मारुति नंदन श्री हनुमान जी की सेवा-पूजा करनी शुरू कर दी और देहांत होने तक वह जगह नहीं छोड़ी। आज वही हनुमान पूजन स्थल तीन मंजिला का भव्य हनुमान मंदिर है। इसके ठाकुरजी, गणेशजी, ऋषि वाल्मीकि, गायत्री मां, श्रीराम दरबार के अलग-अलग और मंदिर भी यहां है।
4. श्री वीर हनुमान मंदिर,समोद, जयपुर
- जयपुर ज़िले में सामोद वीर हनुमानजी का मंदिर पर्वत शिखर पर स्थित है।
- यहां हनुमानजी के दर्शन करने के लिए करीब 1100 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। अनोखी बात यह है कि सीढ़ियों की संख्या आज तक कोई ठीक से गिनकर नहीं बता पाया है।
- हनुमान भक्त दर्शन और पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यहां दूर-दूर से आते हैं। यहां भक्तों के रुकने की भी व्यवस्था है।
- सामोद हनुमान जी मंदिर में लोग बड़ी संख्या में मनोकामनाएं लेकर जाते हैं। मंदिर में गोठ, सवामणी होती है। बारिश के दिनों में यहां झरने भी पहाड़ी से बहते हैं।
पौराणिक कथा
श्री सीतारामजी, वीर हनुमान ट्रस्ट सामोद ने यह मंदिर बनाया गया था। मान्यता है कि यहां पर अपना मंदिर स्थापित करने लिए खुद हनुमानजी ने ही आकाशवाणी के माध्यम से अपनी इच्छा प्रकट की थी। समोद हनुमानजी के भक्तों के अनुसार लगभग 600 वर्ष पूर्व संत नग्नदास और उनके शिष्य लालदास सामोद पर्वत पर तपस्या करने आए थे। संत नग्नदास ने आकाशवाणी सुनी- " मैं यहां वीर हनुमान के रूप में प्रकट होऊंगा।" संत को उसी समय पहाड़ी की चट्टान पर साक्षात हनुमान के दर्शन भी हुए। जिस चट्टान पर उन्हें हनुमानजी के दर्शन प्राप्त हुए, उसे हनुमानजी की मूर्ति का आकार दे दिया। बाद में मंदिर का निर्माण कराया गया।
- देह में सभी मंदिरों में हनुमानजी की मूर्ति लाल रंग का चोला ओढ़े हुए रहती है, लेकिन जयपुर में काले रंग की हनुमान जी मूर्ति 'चांदी की टकसाल स्थित काले हनुमानजी मंदिर' में पूजी जाती है।
- काले हनुमान जी मंदिर में भी ऊपरी बाधाएं दूर होती हैं। हनुमान जी का तंत्र आधार पर यह मंदिर प्रसिद्ध है।
- काले हनुमानजी मंदिर में भक्तों के महंत द्वारा झाड़ा भी लगाया जाता है।
- कई निसंतान दंपति यहां मनोकामना लेकर आए और उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हुई है।
- ऊपरी बाधाएं, बंधन और नजर जैसे दोष भी यहां दूर होते हैं, ऐसी मान्यता है।
पौराणिक कथा
किंवदंती है कि जब हनुमान जी की शिक्षा-दीक्षा पूरी गई, तो उन्होंने अपने गुरु सूर्यदेव से दक्षिणा मांगने का आग्रह किया। इस पर सूर्यदेव ने हनुमान जी से कहा कि उनका बेटा शनिदेव उनकी बात नहीं मानता। अगर हनुमान शनिदेव को उनके पास ले आएंगे, तो वही उनकी गुरु दक्षिणा होगी। गुरु की बात मानकर हनुमान जी शनिदेव के पास लेने पहुंचे। तभी शनिदेव ने क्रोधित होकर हनुमान जी पर अपनी कुदृष्टि डाल दी, जिससे उनका रंग काला पड़ गया। फिर भी हनुमान जी शनिदेव को सूर्यदेव के पास लाने में सफल हुए। हनुमान जी की गुरुभक्ति से प्रभावित होकर शनिदेव ने उन्हें वचन दिया कि शनिवार के दिन जो कोई भी हनुमान जी की उपासना करेगा, उस पर उनकी वक्रदृष्टि का कोई असर नहीं पड़ेगा। तभी से काले हनुमान जी के रूप में मूर्ति पूजा होने लगी।