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Mahashivratri: 17वीं सदी में यहां स्वयं प्रकट हुए थे भोलेनाथ, 13वें ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध है मंदिर

Wed, 15 Feb 2023 12:00 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Wed, 15 Feb 2023 12:00 PM IST
सार

Mahashivratri: 17वीं सदी में यहां स्वयं प्रकट हुए थे भोलेनाथ, 13वें ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध है मंदिर

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Mahashivratri: Damoh's Jageshwarnath Temple where Lord Shiva himself appeared in the 17th century
जागेश्वर नाथ का मंदिर - फोटो : सोशल मीडिया
दमोह मुख्यालय से 16 किमी दूर बुंदेलखंड के प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र जागेश्वरनाथ धाम बांदकपुर में विराजमान भगवान शिव 13वें ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रसिद्ध हैं। यह स्वयंभू शिवलिंग 17वीं शताब्दी में अपने आप ही जमीन के नीचे से प्रकट हुआ था।  तभी से यह तीर्थ क्षेत्र जागेश्वरधाम बांदकपुर के नाम से जाना जाने लगा। इस मंदिर के सामने ही माता पार्वती का मंदिर है। यहां मांगी जाने वाली सभी मनोकामनाएं भगवान भोलेनाथ पूरी करते हैं। महाशिवरात्रि के मौके पर यहां हजारों की तादाद में भक्त जुटते हैं। 


महाशिवरात्रि, सावन सोमवार और अन्य खास दिनों में मंदिर में सुबह चार बजे से ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो जाता है।   देश के बड़े- बड़े राजनेता भी भगवान जागेश्वरनाथ के दर्शन कर चुके हैं। महाशिवरात्रि  पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह सभी धार्मिक रीति रिवाज के साथ संपन्न होता है । इस दिन भगवान को जल अर्पित करने पूरे प्रदेश से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
Mahashivratri: Damoh's Jageshwarnath Temple where Lord Shiva himself appeared in the 17th century
17वीं शताब्दी में स्वयं प्रकट हुआ था शिवलिंग - फोटो : अमर उजाला
आपस में मिल जाते हैं शिव-पार्वती मंदिर के झंडे
महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह धूमधाम से संपन्न होता है । बसंत पंचमी, महाशिवरात्रि पर्व पर हजारों की संख्या में कांवरिए नर्मदा जल लेकर पैदल बांदकपुर पहुंचते हैं और महादेव की पिंडी पर जल चढ़ाते हैं । प्राचीन मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर सवा लाख कांवर चढ़ाने पर माता पार्वती और भगवान शिव के मंदिर के झंडे आपस में मिल जाते हैं और मिलकर अपने आप गांठ बंध जाती है।

प्राचीन इमरती के जल से होता है अभिषेक
 मंदिर के समीप ही एक प्राचीन जलकुंड है, जिसे इमरती कहते हैं। इसका पवित्र जल भोलेनाथ को चढ़ाया जाता है । यह कुंड सदा अपार जल से भरा रहता है इसका पानी आज तक खाली नहीं हुआ

1772 में स्वयं प्रकट हुआ शिवलिंग
श्री जागेश्वरनाथ धाम बांदकपुर का इतिहास अतिप्राचीन है। शास्त्रों के अनुसार स्कंद पुराण के रेवा अवंतिका खंड में जागेश्वरनाथ महादेव का वर्णन मिलता है। कालांतर में बाणासुर नाम का राजा हुआ जो भोलेनाथ का परम भक्त था। जिसके रेत के शिवलिंग बनाने का वर्णन आता है, जो बाद में भौगोलिक परिवर्तनों के कारण भूगर्भ में समा गया और 17वीं शताब्दी 1772 में जमीन के नीचे से स्वयं प्रकट हुआ था।  उस समय बांदकपुर विशाल जंगली क्षेत्र था।
Mahashivratri: Damoh's Jageshwarnath Temple where Lord Shiva himself appeared in the 17th century
महाशिवरात्रि पर लाखों की तादाद में पहुंचते हैं भक्त - फोटो : अमर उजाला
हर 10 वर्ष में बदली जाती है जलहरी
यह शिवलिंग इतना विशाल है कि श्रद्धालुओं की दोनों भुजा में समाहित नहीं हो पाता है । भगवान शिव की महिमा ऐसी है कि शिवलिंग की मोटाई बढ़ती चली जा रही है । जिसका प्रमाण है कि शिवलिंग की चांदी की जलहरी छोटी पड़ने पर हर 10 वर्ष में बदली जाती है।  जागेश्वरनाथ महादेव मंदिर से सौ फीट की दूरी पर पश्चिम में पार्वती माता का मंदिर है। माता पार्वती की प्रतिमा की दृष्टि सीधे भगवान जागेश्वरनाथ महादेव पर आकर पड़ती है। शिव पार्वती के बीच में अवरोध पैदा न हो इसलिए नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई है।
 
मंदिर के उत्तर में यज्ञमंडप ठीक सामने अमृतकुंड, उत्तर में भैरव बाबा व मां दुर्गा का मंदिर, पार्वती जी के दक्षिण में रामजानकी मंदिर, मारूति नंदन मंदिर, नर्मदा, लक्ष्मी नारायण मंदिर,  पश्चिम में राधा कृष्ण मंदिर है यहां मुंडन संस्कार कराने का विशेष महत्व है।
 
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