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100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं अयोध्या में बने ये अनोखे जातीय मंदिर, जानें- क्या है इनकी खासियत

Tue, 22 Dec 2020 05:21 PM IST
ishwar ashish विशाल तिवारी, अमर उजाला, अयोध्या
विशाल तिवारी, अमर उजाला, अयोध्या Published by: ishwar ashish Updated Tue, 22 Dec 2020 05:21 PM IST
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story on caste based temples in Ayodhya.
अयोध्या में बने जातीय मंदिर। - फोटो : amar ujala

श्रीराम मंदिर के निर्माण के साथ ही भव्य और नव्य अयोध्या में यहां के जातीय मंदिर भी चार चांद लगा सकते हैं। अयोध्या के प्रमुख स्थानों पर विशाल परिसर में स्थित यहां के करीब 37 जातीय मंदिर सही रखरखाव न होने व विवादित होने के कारण अपनी भव्यता खोते नजर आ रहे हैं। यदि प्रशासन की नजरें इन पर पड़ जाएं तो ये भी अपनी खोई भव्यता को दोबारा पा सकते हैं। धर्मनगरी के चारों कोनों में स्थित ये सभी जातीय मंदिर 100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इन मंदिरों में यादव मंदिर में राधा-कृष्ण व अन्य मंदिरों श्रीराम-जानकी की पूजा होती है। इनमें से अधिकांश मंदिरों का भीतरी आवरण एक समान होना इनकी विशिष्टता को दर्शाता है।

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कुर्मी मंदिर - फोटो : amar ujala

धर्मनगरी अयोध्या की ऐतिहासिकता को यहां के जातीय मंदिर और भव्य बनाते हैं। एक शोध के अनुसार जाति, बिरादरी के आधार पर यहां करीब 37 मंदिर हैं। ये मंदिर पंचायती हैं और इनका संचालन ट्रस्ट या समिति के माध्यम से किया जाता है। इन जाति आधारित मंदिरों में से कुछ को छोड़ दिया जाए तो इनमें पुजारी से लेकर बावर्ची भी उसी बिरादरी के हैं, जिस बिरादरी का मंदिर है। इन मंदिरों की खासियत है कि मेले व अन्य दिनों में अयोध्या आने वाले लोग अपने इन सजातीय मंदिरों को अपना ठिकाना बनाते हैं। ये लोग अपने मंदिरों में दान-दक्षिणा के साथ अनाज का भी दान देते हैं, जो इनके आय का प्रमुख जरिया भी होता है।

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पासी मंदिर। - फोटो : amar ujala

समय बदलने के साथ इन मंदिरों की समिति में सजातीय संपन्न लोगों को भी जोड़ा गया, जिनकी मदद से इनका जीर्णोद्धार हुआ। यहीं नहीं इन मंदिरों में सजातीय लोगों की आपसी समस्याओं को निपटाने के लिए वर्ष में एक बार पंचायत भी होती है, जिनमें अधिकांश समस्याओं का निपटारा भी किया जाता है। यह भी देखा गया है कि पंचायत द्वारा फैसला दिए जाने के बाद भगवान के विग्रह के सामने दोनों पक्षों को फैसला मानने की शपथ भी दिलाई जाती है। इन मंदिरों की ऐतिहासिकता की बात की जाए तो कुछ 250 साल पुराने तो कुछ 100 से 150 साल पुराने बताए जाते हैं।

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मुराव मंदिर। - फोटो : amar ujala

वर्तमान में इनमें से करीब 50 प्रतिशत मंदिर संसाधनों के अभाव व विवाद के चलते जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। कुछ तो गिरने की कगार पर भी हैं। आर्थिक अभाव में समितियां या ट्रस्ट इनका जीर्णोद्धार नहीं करा पा रही हैं। इन मंदिरों से जुड़े लोगों का कहना है कि आज जब अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण होने जा रहा है, ऐसे में यदि प्रशासन इन मंदिरों को विकसित करें तो ये भी अयोध्या की भव्यता को चार चांद लगा सकते हैं।

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यादव मंदिर। - फोटो : amar ujala

अयोध्या में स्थित जातीय मंदिर
धर्मनगरी के रायगंज-कनीगंज क्षेत्र में स्थित कुर्मी, धोबी, पटवा, कलवार, कसेरा, हलवाई (मोदनवाल), विश्वकर्मा, पासी, सोनार, टेढ़ी बाजा स्थित यादव, निषाद, मुराव, खटिक, लकड़हारा, अशर्फी भवन स्थित कसौंधन, बरई, भुज, खाकी अखाड़ा स्थित राजभर, ऋणमोचनघाट स्थित मद्देशिया, कुशवाहा, पटेल, गोलाघाट स्थित दांगी क्षत्रिय मंदिर, स्वर्णखनि कुंड के पास संत रविदास मंदिर, स्वर्गद्वार स्थित गहोई, हनुमानगढ़ी के पास साहू मंदिर स्थित हैं। इनमें से कुछ मंदिरों की शहर में अलग-अलग स्थानों पर दो से तीन शाखाएं भी हैं।

250 साल से अधिक पुराने  
इन सजातीय मंदिरों में मुराव मंदिर का निर्माण 1889 में, पासी मंदिर का 1842 में, रविदास मंदिर का 1861 में, कसौंधन मंदिर का 1883 में, विश्वकर्मा मंदिर 1890 में, चौरसिया मंदिर 1919 में, कुर्मी मंदिर 1912 में, खटिक मंदिर 1920 में, ठठेर मंदिर 1913 में, निषाद मंदिर 1917, हलवाई मंदिर का निर्माण 1935 में किया गया था।

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