गदर के निशान देखने हों तो रेजीडेंसी से ज्यादा मकबूल जगह और कहीं नहीं मिलेगी। उस दौर में आजादी के मतवालों ने अंग्रेज अधिकारियों के गढ़ रेजीडेंसी में पूरे 86 दिन तक कब्जा जमाए रखा। इस दौरान कई छोटे-बड़े अंग्रेज सैनिक और अधिकारी आजादी के मतवालों के हाथों मारे गए। संघर्ष में कई हिंदुस्तानी सैनिक भी शहीद हुए। अतीत की कई कहानियां समेटे रेजीडेंसी आज भी शहर आने वाले पर्यटकों को अपने मोहपाश में जकड़ लेती है।
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सुनहरे अतीत की यादें समेटे है लखनऊ की रेजीडेंसी, आज भी यहां मौजूद हैं गदर के निशान
Sat, 16 Feb 2019 05:27 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Sat, 16 Feb 2019 05:27 PM IST
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डेमो
- फोटो : डेंमो
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रेजीडेंसी
- फोटो : डेमो
रेजीडेंसी का निर्माण नवाब आसफुद्दौला के शासनकाल में हुआ। नवाब ने अंग्रेजों की सुविधा को देखते हुए उन्हें दरिया के किनारे एक ऊंचे टीले पर बसाया। 1800 में नवाब सआदत अली खां के शासन में रेजीडेंसी बन कर तैयार हुई। पहले ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से नियुक्त अधिकारी इसमें रहते थे। लखौरी ईंट और सुर्ख चूने से बनी इस दो मंजिले इमारत में बड़े-बड़े बरामदे और एक पोर्टिको शामिल था। रेजीडेंसी के नीचे आज भी एक बड़ा तहखाना है। अवध के रेजीडेंट इस तहखाने में आराम फरमाते थे। गदर के वक्त तमाम अंग्रेज महिलाओं और बच्चों ने इसी तहखाने में शरण ली थी। बकौल इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीन, इसी जगह पहली जुलाई 1857 को कर्नल पामर की बेटी के पैर में गोली लगी थी। इसी भवन की ऊपरी मंजिल के पूर्वी सिरे वाले कमरे में 2 जुलाई 1857 को सर हेनरी लॉरेंस को क्रांतिकारियों ने गोली मारी थी।
रेजीडेंसी
- फोटो : amar ujala
बैंक्वेट हॉल
अवध हुकूमत ने इस इमारत में ब्रिटिश रेजीडेंट के लिए दावत खाना भी बनवाया था। ये दो मंजिला भवन एक दौर में यूरोपियन फर्नीचर और चीन के सजावटी सामान से भरा पड़ा था। इसके मुख्य कक्ष में फाउंटेन चलते थे। बादशाह नसीरुद्दीन हैदर के दौर में इस हॉल में बहुत दावतें हुआ करती थीं। गदर के दिनों में इस भवन को अस्पताल बना दिया गया। 8 जुलाई के हमले में रेवरेंड पोलीहेम्पटन यहां बहुत बुरी तरह से जख्मी हुए।
अवध हुकूमत ने इस इमारत में ब्रिटिश रेजीडेंट के लिए दावत खाना भी बनवाया था। ये दो मंजिला भवन एक दौर में यूरोपियन फर्नीचर और चीन के सजावटी सामान से भरा पड़ा था। इसके मुख्य कक्ष में फाउंटेन चलते थे। बादशाह नसीरुद्दीन हैदर के दौर में इस हॉल में बहुत दावतें हुआ करती थीं। गदर के दिनों में इस भवन को अस्पताल बना दिया गया। 8 जुलाई के हमले में रेवरेंड पोलीहेम्पटन यहां बहुत बुरी तरह से जख्मी हुए।
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रेजीडेंसी
- फोटो : amar ujala
सेंट मेरी चर्च
योगेश प्रवीन बताते हैं कि 1810 में रेजीडेंसी में गाथिक शैली का सेंट मेरी गिरिजाघर बन कर तैयार हुआ। गदर के समय इसे गल्ले का गोदाम बना दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम में मारे गए रेजीडेंसी के पहले अंग्रेज की कब्र की इसी चर्च में बनवाई गई। यहीं नवाब मुस्तफा खां और मिर्जा मुहम्मद हसन खां की मजार भी है।
ट्रेजरी हाउस
रेजीडेंसी में यूरोपियन अधिकारियों का विनियम विभाग था। 1857 की क्रांति में इसके केंद्रीय भाग को प्रयोगशाला बना दिया गया। इसमें इनफील्ड गन की कार्टिंजेज बनाए जाते थे। इसके निकट ही पुराने बरगद के पास रेजीडेंसी का पोस्ट आफिस था जिसमें गदर के समय टूल्स शेल्स का निर्माण होने लगा।
योगेश प्रवीन बताते हैं कि 1810 में रेजीडेंसी में गाथिक शैली का सेंट मेरी गिरिजाघर बन कर तैयार हुआ। गदर के समय इसे गल्ले का गोदाम बना दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम में मारे गए रेजीडेंसी के पहले अंग्रेज की कब्र की इसी चर्च में बनवाई गई। यहीं नवाब मुस्तफा खां और मिर्जा मुहम्मद हसन खां की मजार भी है।
ट्रेजरी हाउस
रेजीडेंसी में यूरोपियन अधिकारियों का विनियम विभाग था। 1857 की क्रांति में इसके केंद्रीय भाग को प्रयोगशाला बना दिया गया। इसमें इनफील्ड गन की कार्टिंजेज बनाए जाते थे। इसके निकट ही पुराने बरगद के पास रेजीडेंसी का पोस्ट आफिस था जिसमें गदर के समय टूल्स शेल्स का निर्माण होने लगा।
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रेजीडेंसी
- फोटो : डेमो
हेनरी लाॅरेंस स्मारक
इतिहासकार रोशन तकी बताते हैं, रेजीडेंसी में रहने वाले ब्रिटिश अधिकारियों में हेनरी लाॅरेंस बेहद कुशल प्रशासक था। गदर की लड़ाई में मरने वाले हेनरी की मजार पहले 51 फीट ऊंचे और बड़े घेरे में बना था। 1904 में अंग्रेजी शासन काल में उसे ये नई रूपरेखा दी गई।
स्वतंत्रता संग्राम में महत्व
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रेजीडेंसी का अपना ही महत्व है। बेगम हजरत महल के प्रमुख सहायक राजा जियालाल की कमांड में लड़े गए चनहट की लड़ाई के अगले दिन 30 जून 1857 को सैय्यद बरकत अहमद के नेतृत्व में हिंदुस्तानियोें ने इस विदेशी गढ़ पर गोलीबारी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों ने 86 दिन तक यहां अपना कब्जा रखा। इस दौरान तमाम अंग्रेज परिवार यहां कैद रहे। 17 नवंबर 1857 की रात मौलवी अहमदउल्ला शाह ने रेजीडेंसी पर आखिरी हमला किया, जिसके दूसरे दिन काॅलिन कैम्पबेल कानपुर से सेना लेकर आए और फिर उस पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।
इतिहासकार रोशन तकी बताते हैं, रेजीडेंसी में रहने वाले ब्रिटिश अधिकारियों में हेनरी लाॅरेंस बेहद कुशल प्रशासक था। गदर की लड़ाई में मरने वाले हेनरी की मजार पहले 51 फीट ऊंचे और बड़े घेरे में बना था। 1904 में अंग्रेजी शासन काल में उसे ये नई रूपरेखा दी गई।
स्वतंत्रता संग्राम में महत्व
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में रेजीडेंसी का अपना ही महत्व है। बेगम हजरत महल के प्रमुख सहायक राजा जियालाल की कमांड में लड़े गए चनहट की लड़ाई के अगले दिन 30 जून 1857 को सैय्यद बरकत अहमद के नेतृत्व में हिंदुस्तानियोें ने इस विदेशी गढ़ पर गोलीबारी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों ने 86 दिन तक यहां अपना कब्जा रखा। इस दौरान तमाम अंग्रेज परिवार यहां कैद रहे। 17 नवंबर 1857 की रात मौलवी अहमदउल्ला शाह ने रेजीडेंसी पर आखिरी हमला किया, जिसके दूसरे दिन काॅलिन कैम्पबेल कानपुर से सेना लेकर आए और फिर उस पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।