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International disability day: दिव्यांगजनों की कहानी उन्हीं की जुबानी, बोले- लोगों ने किया निराश पर...

Thu, 03 Dec 2020 11:59 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव सचिन त्रिपाठी, अमर उजाला, लखनऊ
सचिन त्रिपाठी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Thu, 03 Dec 2020 11:59 AM IST
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special story on international disability day
हिमानी बुंदेला व कमल शर्मा - फोटो : अमर उजाला
दिव्यांग शारीरिक रूप से अक्षम हो सकते हैं पर उनमें भी अपार संभावनाएं हैं। लोगों की सकारात्मक सोच और थोड़ा सा सहयोग मिले तो वे भी आम इंसान की तरह सब कर सकते हैं। यह कहना है तमाम दुविधा, समस्या और नकारात्मक माहौल से उबरकर केंद्रीय विद्यालय में मेंटल मैथ के शिक्षक हिमानी बुंदेला का। हिमानी की दोनों आंखों की रोशनी एक एक्सीडेंट में उस समय चली गईं जब वह 11वीं में थीं। बावजूद, हिमानी ने हिम्मत नहीं हारी और हौसलों से सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गईं। अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस पर पेश है ऐसे ही दिव्यांगजनों की कहानी, उन्हीं की जुबानी, जो आज दूसरों के लिए नजीर है...।

 
special story on international disability day
आदर्श कुमार - फोटो : अमर उजाला
अपने जैसे दूसरे दिव्यांगों की मदद के लिए ही पीसीएस किया क्रैक
पांच साल की उम्र में पोलियो और कक्षा 7 में मेरी मस्तिष्क ज्वर से श्रवण शक्ति कम हो गई, लेकिन हार नहीं मानी। मैं खुद को दिव्यांग नहीं मानता था। बचपन से किताबों से गहरा लगाव रहा और वही मेरी सबसे बड़ी साथी बनी। शिक्षक जब क्लास में बोलते तो समझ नहीं पाता था तो उनके चेहरे और होठों से उनके बोल समझने लगा। ऐेसे ही इंटर कर कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक और पीजी किया। फिर 2010 में पुनर्वास विवि से बीएड विशेष शिक्षा, फिर एमएड, नेट-जेआरएफ और शोध किया। दूसरों के लिए कुछ करने के जुनून ने मुझे प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर मोड़ दिया। इसमें शिक्षक डॉ. मृत्युंजय मिश्रा ने मार्गदर्शन किया। वर्ष 2015 में मैं शिक्षक बना तो लगा कि अब कुड बड़ा करना है। मैं निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता गया और अंत मे 2018 की पीसीएस परीक्षा में सफलता मिली और श्रम परिवर्तन अधिकारी के पद पर चयन हो गया। - आदर्श कुमार, पीसीएस-2018
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हिमानी बुंदेला - फोटो : अमर उजाला
लोगों ने किया निराश, पर परिजनों ने दी हर हाल में जीतने की हिम्मत
मुझे बचपन से ही विज्ञान में रुचि थी। मैं कक्षा 11 से ही डॉक्टर बनने का ख्वाब देखने लगी थी। उसी समय एक एक्सीडेंट हुआ, जिससे मेरी आंखों को गंभीर चोट पहुंची। आठ महीने में 4 बार सर्जरी हुई, लेकिन हालत नहीं सुधरी। कुछ महीनों में ही मेरा जीवन पूरी तरह से बदल चुका था। समझ नहीं आ रहा था कि आगे कैसे पढ़ाई करूं, पर घर वालों ने हौसला बढ़ाया और भरपूर मदद की। नतीजतन 12वीं की परीक्षा मैंने पीसीबी से पास कर ली। लेकिन, दृष्टिबाधित होने की वजह से कहीं दाखिला नहीं मिला। हार कर मैंने बीएम में दाखिला ले लिया। इसी बीच मुझे पुनर्वास विवि में डीएड स्पेशल एजुकेशन की प्रवेश परीक्षा पास करके दाखिले का मौका मिला। इसके बाद मेरी जिंदगी बदल गई। यहीं रहकर पढ़ाई पूरी की तथा शिक्षक पात्रता परीक्षा भी पास की। आज केंद्रीय विद्यालय में नौकरी कर रही हूं। मेरा मानना है कि समाज के लोग अगर हमें सहयोग करे तो हमारे जैसे काफी लोग अपनी क्षमता साबित कर सकते हैं। 
- हिमानी बुंदेला, शिक्षिका, केंद्रीय विद्यालय 


 
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कमल शर्मा - फोटो : अमर उजाला
जीवन में कभी नहीं हुआ निराश 
मेरी सबसे बड़ी ताकत मेरा परिवार है। बचपन से दृष्टिबाधित हूं, पर कभी हिम्मत नहीं हारी। सात साल की उम्र में मेरा दाखिला दृष्टिबाधित विद्यालय में हुआ था। यहां पढ़ाई के साथ खेल में रुचि जागी। नतीजा, जूडो में वर्ल्ड चैंपियनशिप तक पहुंचा। साथ ही यूपी ब्लाइंड क्रिकेट का कप्तान भी बनाया गया। मेरे गृह जनपद पीलीभीत में मुझे लोकसभा चुनाव के दौरान ब्रांड अम्बेसडर भी बनाया गया। मुझे कोरोना वॉरियर सम्मान भी मिला। फिलहाल नौकरी की तैयारी में जुटा हूं। - कमल शर्मा, खिलाड़ी व समाजसेवी 
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लवलेश सिंह - फोटो : अमर उजाला
ईश्वर का भरोसा हम पर ज्यादा 
ईश्वर जिन्हें कुछ कमकर के भेजता है, उनपर उसका भरोसा ज्यादा होता है। वो जानता है मुश्किलें कैसी भी हों ये हार नहीं मानेगा। मै हर रोज ईश्वर के इसी विश्वास को सही साबित करने के लिए जागता हूं। अब तक के जीवन में निराशा हाथ नहीं लगी है। अच्छी बात है कि मैं जहां काम करता हूं वहां मेरे जैसे विद्यार्थी ही आते हैं। सबसे बड़ा भरोसा खुद पर रखना चाहिए कि आपके लिए हजारों रास्ते खुले हुए हैं। खुद पर भरोसा रखेंगे तो आपको सहयोग करने के लिए भी काफी लोग खड़े रहेंगे। इसी भरोसे से आपका लक्ष्य भी आसान होगा। - लवलेश सिंह, शिक्षक, स्पर्श राजकीय दृष्टिबाधित विद्यालय
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