तमाम मानसिक परेशानियों को दूर करने वाले मनोचिकित्सकों व मनोवैज्ञानिकों के जीवन में भी तनाव कम नहीं होता है। महामारी के इन दो सालों की बात करे तो लोगों का तनाव दूर करने की उनकी जिम्मेदारियां कहीं ज्यादा बढ़ गईं। ऐसे में बतौर मेंटल हेल्थ काउंसलर हेल्पलाइन के जरिए वे तनावग्रस्त लोगों की काउंसलिंग में लगातार जुटे रहें और यह प्रक्रिया अनवरत जारी है। जरा सोचिए, हम यदि थोड़ी देर को किसी की परेशानी या निराशा की कहानी सुन लें तो खुद उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते हैं। ऐसे में इनकी मन:स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है कि भावनात्मक व संवेदनात्मक तौर पर ये कितना प्रभावित होते होंगे। अमर उजाला ने ऐसे ही मनोवैज्ञानिक व मनोचिकित्सकों के मन को टटोलने का प्रयास किया और उन्हीं से जाना कि आखिर वे किस तरह अपने मन को सेहतमंद रखते हैं...। पेश है एक रिपोर्ट...।
स्पेशल रिपोर्ट: जानें, तमाम परेशानियों के बावजूद खुद को कैसे फिट रखते हैं ये 'मन के डॉक्टर'
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हर छह महीने में लेती हूं एक सेशन
- डॉ. नेहा आनंद, मेंटल हेल्थ काउंसलर
मरीज की परेशानी सुनने के साथ ही हमें इस बात का ध्यान रखना होता है कि हम उस नकारात्मकता के प्रभाव में न आएं। इसके लिए हमें डिटॉक्सिफिकेशन तकनीक का सहारा लेना पड़ता है। हम हैं काउंसलर, मनोवैज्ञानिक, पर इससे पहले हम इंसान हैं। एक्सरसाइज, ध्यान जैसी चीजों से हम मेंटल हाइजीन को बनाए रखने की कोशिश करते हैं। इसके साथ-साथ जो सबसे ज्यादा जरूरी चीज है वो है खुद की मानसिक स्थिति का मूल्यांकन करना। इसके लिए हम छह महीने पर प्रोफेशनल काउंसलर से एक सेशन जरूर लेते हैं। दरअसल, बहुत सी चीजें ऐसी हैं, जिनसे कोई भी बच नहीं पाता है। दुख-तकलीफ, रोना-हंसना स्वाभाविक प्रक्रिया है और हम लोग इससे अछूते कैसे रह सकते हैं, पर हमारे परामर्श देने से पहले खुद को इसके लिए तैयार रखना पड़ता है।
सुबह-शाम के ध्यान से मिलती है ताकत
- डॉ. मानिनी श्रीवास्तव, मेंटल हेल्थ काउंसलर
एक मेंटल हेल्थ काउंसलर के तौर पर हम लोग भावनाओं के कई तरह के उतार-चढ़ाव से गुजरते हैं। हालांकि जब हम ट्रेनिंग के दौर में होते हैं तो उस वक्त हमारी लर्निंग ही इस तरह से हो जाती है कि जो हमें हर स्थिति से संतुलन बैठाना सीखा देती है। क्योंकि यदि हम ही हताश और परेशान होंगे तो हमारी ड्यूटी कैसे पूरी होगी और समस्याएं लेकर आने वालों को कौन संभालेगा। द्रवित होते अपने मन को हमें संभालना ही पड़ता है। इसके लिए हम सुबह 30 मिनट एक्सरसाइज और शाम को कुछ देर ध्यान को जरूर देते हैं, ये चीजें खुद को रीचार्ज करती हैं।
बागवानी और योग से करते हैं भावनाओं का प्रबंधन
- डॉ. आदर्श त्रिपाठी, मनोरोग विशेषज्ञ, केजीएमयू
सबसे महत्वपूर्ण है मानसिक अनुशासन। एक मनोरोग विशेषज्ञ के तौर पर हम खुद के लिए भी साइकोथेरेपी प्रिंसिपल को अपनाते हैं। आसान भाषा में कहें तो हम भी सोच और भावनाओं के स्तर का प्रबंधन करते हैं। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जो कुछ भी हम सोचते हैं सब कुछ हमारे काम का नहीं होता है। उसमें से हमें फिल्टर करके चीजों को रखना होता है। ऐसा ही कुछ भावनाओं के साथ होता है। इस प्रबंधन के लिए मैं योग और बागवानी के साथ-साथ परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताना पसंद करता हूं। योग के लिए मैंने ट्रेनिंग क्लास ली हैं। खाली वक्त में कुछ कठिन आसनों का अभ्यास किया है और उसमें लगातार परफेक्शन लाने की कोशिश कर रहा हूं। इसके अलावा पत्नी को बागवानी का शौक है और उनके साथ मुझे भी इसकी आदत पड़ गई। मैंने अपने घर के बाग के साथ ही घर के सामने के पार्क को भी संवारने की कोशिश की है और इसमें सफल भी रहा हूं। ये कुछ ऐसी चीजें हैं, जिनके कारण हम खुद को मानसिक रूप से मजबूत पाते हैं।
- डॉ. शाहीन फातिमा खान, मेंटल हेल्थ काउंसलर
निसंदेह नॉनस्टाप समस्याओं के समाधान पर काम जारी है। ऐसा नहीं कि हम लोगों को झुंझलाहट नहीं होती है, परेशान हम भी बहुत होते हैं। ऐसी स्थिति में हम आंख बंद करके बैठ जाना और हल्का संगीत सुनना पसंद करते हैं। दूसरे सबसे महत्वपूर्ण है कि किसी सीनियर से बात कर ली जाए, किसी की सलाह ले ली जाए। दरअसल बात करने से मन हलका हो जाता है और बहुत सी समस्याओं का समाधान भी मिल जाता है। हम मरीजों से कहते हैं कि मन का गुबार निकालो, चाहे बात करे, चाहे रोकर। हम लोग खुद भी ऐसा ही करते हैं।