कितनी खुशगवार रही होगी आजाद भारत की पहली सुबह। शहर, गांव, गली, मोहल्लों में उत्साह केसाथ ही घर केभीतर महिलाओं में भी कितना उल्लास था। यह बताने के लिए राजधानी में बहुत कम लोग ही हैं। उनमें से एक नाम है 89 वर्षीय हेना उप्रेती का। उन्होंने क्रांतिकारी दुर्गा भाभी केसाथ तकरीबन 25 साल काम किया। दुर्गा भाभी द्वारा स्थापित लखनऊ मॉन्टेसरी स्कूल में वे आजीवन शिक्षिका रहीं। आइये जानते हैं उन्हीं से उस दौर के कुछ रोचक किस्से।
मिलिए आजादी के गवाह रहे लोगों से जिन्होंने अंग्रेजी शासन देखा, ...और सुनाए उस दौर के कुछ रोचक किस्से
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आजादी की खुशी में 12 रसगुल्ले खा गईं
हेना उप्रेती बताती हैं कि उस दिन हम लोग लखनऊ में ही थे। पिताजी फौज में थे। जिस दिन देश आजाद हुआ पिताजी खूब सारी मिठाई घर लाए। मुझे रसगुल्ले बहुत पसंद थे। मुझे याद है कि मारे खुशी के मैं उस दिन 12 रसगुल्ले खा गई। उस दिन पिताजी ने अपनी वर्दी पर तिरंगा लगा रखा था। घर केबाहर मोहल्ले में देशभक्ति गीत और नारे गूंज रहे थे तो घर के भीतर महिलाएं पकवान बनाने और मंगल गीत गाने में मशगूल थीं। अब भी सोचती हूं वो दिन तो मन आकाशभर खुशी से झूम उठता है।
अपनी पॉकेट मनी से बच्चे को दिलाई ड्रेस
वे बताती हैं कि 15 अगस्त 1947 को जब मैं अपने लिए कुछ खरीदारी करने बाजार गई तो चारों ओर जश्न का माहौल था। इस दौरान मुझे एक बेहद गरीब छोटा बच्चा दिखा जिसके तन पर फटे कपड़े थे। मैंने अपनी पॉकेट मनी से उसे एक पैंट और शर्ट दिला दी। घर खाली हाथ लौटी तो सबने पूछा तो मैंने बता दिया। दरअसल देश की आजादी केसाथ इस काम की खुशी मुझे भीतर तक प्रफुल्लित कर रही थी।
वे बताती हैं कि आजादी के बाद देश हित में कई निर्णय लिए गए जिसमें मैं पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के1971 में लिए गए साहसिक फैसले से बहुत प्रभावित हुई। दूसरा मोदी सरकार ने जिस तरह से कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किया, उससे मुझे बेहद खुशी हुई।
बेटी की तरह मानती थीं दुर्गा भाभी
हेना उप्रेती ने बताया कि आजादी के बाद प्रदेश के पहले मॉन्टेसरी विद्यालय लखनऊ मॉन्टेसरी में शिक्षिका के तौर पर कार्य किया। इस विद्यालय की संस्थापिका क्रांतिकारी दुर्गा भाभी केसाथ तकरीबन 25 साल तक रहीं। बताती हैं कि वे उन्हें अपनी बेटी की तरह मानती थीं। साहित्यकार यशपाल भी उन्हें बहुत स्नेह करते थे। पति उत्तराखंड से थे और एग्रीकल्चर विभाग से एडिशनल डायरेक्टर के पद से रिटायर हुए।
नरही की निवासी करीब 80 वर्षीय सुधा शुक्ला भी 15 अगस्त 1947 की गवाह रही हैं। वे बताती हैं कि मैं बहुत छोटी थी तो ज्यादा कुछ तो उस दिन का याद नहीं लेकिन इतना ध्यान है कि उस दिन चारों ओर ‘आजादी मिल गई’ का शोर था। उस वक्त मैं कानपुर में थी। सभी जगह मिठाइयां बंट रही थीं। बैंक में मैनेजर रहे पति शिवकुमार शुक्ला को गुजरे हुए 16-17 साल हो गए। अब वे अपने बेटे के साथ यहां रहती हैं।
सुधा शुक्ला बताती हैं कि भारत की आजादी के बाद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। एमए, बीएड होने के बावजूद नौकरी नहीं की। पति की इच्छा से घर और बच्चों को संभाला। उनका बड़े पुत्र नेशनल हेराल्ड अखबार में काम करते थे तो दूसरे पुत्र मुंबई में एक कंपनी में मैनेजर रहे।
वे कहती हैं कि हमें बड़ी मुश्किल से आजादी मिली, देश ने तरक्की भी की लेकिन अब पहले जैसे लोग नहीं रहे जो अपनी बात पर अडिग रहते थे और नैतिक मूल्यों को मानते थे। वक्त केसाथ काफी कुछ बदल गया। पिछले कई दशकों में लखनऊ में भी काफी बदलाव आया।