राजधानी लखनऊ में फैजुल्लागंज की मामा कॉलोनी कई दिनों से बाढ़ की चपेट में है। घरों में पानी घुसा है और लोगों के सामने खाने के साथ पीने के पानी का भी संकट है। ऐसे में शनिवार को सामाजिक संगठनों और जिला प्रशासन की ओर से राहत सामग्री पहुंचाई गई। क्षेत्रीय विधायक नीरज बोरा, एमएलसी मुकेश शर्मा, सांसद राजनाथ सिंह के प्रतिनिधि दिवाकर त्रिपाठी और पार्षद मान सिंह यादव दो नावों से सामग्री लेकर कॉलोनी पहुंचे।
चार दिन से घरों में कैद लोगों के ये नाव सिर्फ राशन नहीं, उम्मीद लेकर पहुंची थी। नाव जैसे-जैसे कॉलोनी के भीतर बढ़ी, छतों और दरवाजों पर खड़े लोगों की निगाहें उसी पर टिक पास पहुंचते ही लोग नीचे उतरने लगे।
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बाढ़ के पानी से होकर बेटे संग निकलता युवक।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
एक व्यक्ति ने कहा, 'साहब, परिवार बहुत परेशान है। न बिजली है और न पानी। एक-एक मिनट कैसे काट रहे हैं, यह हम ही जानते हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे और हम काम पर नहीं जा पा रहे। रात होते ही डर लगता है कि कोई जीव जंतु पानी के रास्ते घर में न आ जाए। छोटे लाल, मनोज कश्यप, दीपू सिंह और उमेश कुमार ने राहत सामग्री पहुंचाने बालों का आभार जताया। लोगों को उम्मीद है कि जल्द पानी कम होगा और जिंदगी पटरी पर लौटेगी।
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राहत सामग्री वितरित करते विधायक नीरज बोरा व अन्य।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
सुबह टूट जाती है रात की उम्मीद
कॉलोनीवासियों ने बताया कि कई दिनों से जिंदगी घरों में कैद है। रात में उम्मीद रहती है कि सुबह पानी कम मिलेगा, लेकिन आंख खुलते ही चारों तरफ पानी नजर आता है। न कोई बाहर जा पा रहा है और न आसानी से अंदर आ पा रहा है।
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बाढ़ के बीच नाव से आते जाते लोग।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
माइक की आवाज ने दी राहत की खबर
विनय प्रताप घर की छत पर खड़े थे। दूर से नाव आती दिखी तो लगा कि शायद अधिकारी या जनप्रतिनिधि निरीक्षण करने आए हैं। तभी माइक से आवाज गूंजी आप लोगों के लिए राशन आया है।' यह सुनते हो उनके चेहरे पर खुशी आ गई। कई दिनों को परेशानी के बीच यह आवाज कॉलोनी के लोगों के लिए राहत और उम्मीद बनाकर आई।
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ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी ने बाल्टी के ढक्कन के सहारे धूप से बचाव किया।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
बाढ़ में फंसे परिवारों को नहीं पहुंच रही मदद
फैजुल्लागंज के शारदा नगर और कैलाश विहार में जलभराव से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। कई परिवार अब भी घरों में फंसे हैं। इनका आरोप है कि राहत कार्य कॉलोनियों के बाहरी हिस्से तक सीमित है। अंदर फंसे लोगों तक राहत सामग्री और मदद नहीं पहुंच रही है।