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ऑनलाइन कवि सम्मेलन में प्रतिष्ठित रचनाकारों को सुनकर मंत्रमुग्ध हुए श्रोता, विदेशों में भी लोगों ने उठाया आनंद
Mon, 14 Sep 2020 02:38 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Mon, 14 Sep 2020 02:38 PM IST
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डॉ राहुल अवस्थी, डॉ विष्णु सक्सेना, प्रियांशु गजेंद्र
- फोटो : amar ujala
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अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें देश के प्रतिष्ठित रचनाकारों ने अपने गीतों और कविताओं से हजारों श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए रखा। इस दौरान देश के कोने-कोने से ही नहीं, विदेशों से भी बड़ी संख्या में दर्शकों ने घर बैठे काव्य रस का आनंद उठाया। कवियों ने न सिर्फ हिंदी के वैभव और समृद्धि को अपनी रचनाओं में पिरोया बल्कि उनमें हिंदी के तिरस्कार की पीड़ा भी नजर आई। तभी तो देश के प्रख्यात गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने अपने गीत के माध्यम से देशवासियों से हिंदी के उत्थान के लिए आह्वान करते हुए गीत पढ़ा- ‘बदले परिवेश में, कबीरा के देश में, स्वर्णिम प्रभात करो रे... कोई तो हिंदी की बात करो रे...’। इसके अलावा युवा गीतकार प्रियांशु गजेंद्र, अवधी भाषा के विख्यात कवि डॉ. अशोक अज्ञानी, हिंदी मंचों के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राहुल अवस्थी, ओज के कवि अभय निर्भीक, शृंगार की कवयित्री शिखा श्रीवास्तव और युवा कवि प्रख्यात मिश्रा ने अपने काव्यपाठ से श्रोताओं का मनोरंजन करने के साथ ही देश और हिंदी के हाल को बड़ी संजीदगी से बयां किया। संचालन डॉ. राहुल अवस्थी ने किया। इस दौरान सभी रचनाकारों ने अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ अभियान को मातृभाषा के उत्थान में किया जा रहा अभूतपूर्व व सराहनीय कार्य बताया।
डॉ विष्णु सक्सेना
- फोटो : amar ujala
खूब सराहे गए डॉ. विष्णु सक्सेना के गीत
ऑनलाइन आयोजन के दौरान रविवार को डॉ. विष्णु सक्सेना का अलग ही अंदाज देखने को मिला। अपने प्रेम गीतों के लिए मशहूर डॉ. विष्णु ने जब हिंदी पर गीत पढ़ा तो दर्शकों की ओर से उन्हें खूब वाहवाही मिली। दरअसल उन्होंने बिल्कुल नए गीत सुनाए जो इससे पहले मंचों पर नहीं सुने गए थे। इसीलिए काव्य प्रेमियों को और भी ज्यादा आनंद आया। उन्होंने शृंगार का गीत पढ़ा-
तन और मन हैं पास बहुत फिर, सोच-सोच में क्यों दूरी है
हम बदले तो कहा बेवफा, वे बदले तो मजबूरी है।
इसके बाद उन्होंने बड़ी खूबसूरती से इस गीत को आगे बढ़ाते हुए पढ़ा-
गंगा के तट बैठ रेत के, बना-बना के महल गिराए।
उसने हमको, हमने उसको जाने कितने सपन दिखाए।
झूठ-मूठ को मांग भरी थी, हाथ अभी तक सिन्दूरी है।
हिंदी गीत से लूटी वाहवाही
बदले परिवेश में, कबीरा के देश में
स्वर्णिम प्रभात करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
जन्म दिया जिसने, हां जिसने ही पाला
हां हां उसी ने खिलाया निवाला
दिल के अरमानों पर, अनगिन अहसानों पर
कुछ दृष्टिपात करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
हिंदी की बिंदी को मस्तक लगाओ
हिंदी की वीणा को खुलकर बजाओ
बहुगुण विचारों की, सुगठित संस्कारों की
अच्छी शुरुआत करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
खूब सराहे गए डॉ. विष्णु सक्सेना के गीत
ऑनलाइन आयोजन के दौरान रविवार को डॉ. विष्णु सक्सेना का अलग ही अंदाज देखने को मिला। अपने प्रेम गीतों के लिए मशहूर डॉ. विष्णु ने जब हिंदी पर गीत पढ़ा तो दर्शकों की ओर से उन्हें खूब वाहवाही मिली। दरअसल उन्होंने बिल्कुल नए गीत सुनाए जो इससे पहले मंचों पर नहीं सुने गए थे। इसीलिए काव्य प्रेमियों को और भी ज्यादा आनंद आया। उन्होंने शृंगार का गीत पढ़ा-
तन और मन हैं पास बहुत फिर, सोच-सोच में क्यों दूरी है
हम बदले तो कहा बेवफा, वे बदले तो मजबूरी है।
इसके बाद उन्होंने बड़ी खूबसूरती से इस गीत को आगे बढ़ाते हुए पढ़ा-
गंगा के तट बैठ रेत के, बना-बना के महल गिराए।
उसने हमको, हमने उसको जाने कितने सपन दिखाए।
झूठ-मूठ को मांग भरी थी, हाथ अभी तक सिन्दूरी है।
हिंदी गीत से लूटी वाहवाही
बदले परिवेश में, कबीरा के देश में
स्वर्णिम प्रभात करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
जन्म दिया जिसने, हां जिसने ही पाला
हां हां उसी ने खिलाया निवाला
दिल के अरमानों पर, अनगिन अहसानों पर
कुछ दृष्टिपात करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
हिंदी की बिंदी को मस्तक लगाओ
हिंदी की वीणा को खुलकर बजाओ
बहुगुण विचारों की, सुगठित संस्कारों की
अच्छी शुरुआत करो रे...
कोई तो हिंदी की बात करो रे...
खूब सराहे गए डॉ. विष्णु सक्सेना के गीत
डॉ राहुल अवस्थी
- फोटो : amar ujala
हिंदी को सब में खपने दो, हिंदी में सबको खपने दो...
संचालन कर रहे डॉ. राहुल अवस्थी ने अपने काव्य पाठ में बड़ी खूबसूरती और बेबाकी के साथ हिंदी की उन्नति का रास्ता बताया। उन्होंने पढ़ा-
हिंदी को सब में खपने दो, हिंदी में सबको खपने दो, हिंदी को अपनी आंखें दो, हिंदी को अपने सपने दो। हिंदी को भीषण संघर्षों की ज्वालाओं में तपने दो, हिंदी कठजीवी है, इसको अपने आप पनपने दो।
डॉ. राहुल अवस्थी ने हिंदी भाषा का बखान करते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज में पढ़ा-
जो कहते हैं हिंदी भाषा अपनी किस्मत से हेठी है, वो सुन लें, इसके बावजूद ये जेठी थी, ये जेठी है, इसने वाणी के चंदन में अपनी मर्याद लपेटी है, ये संस्कृत की बेटी की बेटी की बेटी की बेटी है।
इसके बाद उन्होंने अपनी कविता के जरिए यह भी बताया कि केवल सरकारी तंत्र पर भरोसा कर हिंदी का विकास संभव नहीं है। उन्होंने पढ़ा-
सरकारी जोर-जबरदस्ती से तुष्ट नहीं हो सकती है, आयोगों की पहरेदारी से पुष्ट नहीं हो सकती है।
संचालन कर रहे डॉ. राहुल अवस्थी ने अपने काव्य पाठ में बड़ी खूबसूरती और बेबाकी के साथ हिंदी की उन्नति का रास्ता बताया। उन्होंने पढ़ा-
हिंदी को सब में खपने दो, हिंदी में सबको खपने दो, हिंदी को अपनी आंखें दो, हिंदी को अपने सपने दो। हिंदी को भीषण संघर्षों की ज्वालाओं में तपने दो, हिंदी कठजीवी है, इसको अपने आप पनपने दो।
डॉ. राहुल अवस्थी ने हिंदी भाषा का बखान करते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज में पढ़ा-
जो कहते हैं हिंदी भाषा अपनी किस्मत से हेठी है, वो सुन लें, इसके बावजूद ये जेठी थी, ये जेठी है, इसने वाणी के चंदन में अपनी मर्याद लपेटी है, ये संस्कृत की बेटी की बेटी की बेटी की बेटी है।
इसके बाद उन्होंने अपनी कविता के जरिए यह भी बताया कि केवल सरकारी तंत्र पर भरोसा कर हिंदी का विकास संभव नहीं है। उन्होंने पढ़ा-
सरकारी जोर-जबरदस्ती से तुष्ट नहीं हो सकती है, आयोगों की पहरेदारी से पुष्ट नहीं हो सकती है।
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शिखा श्रीवास्तव
- फोटो : amar ujala
हम नहीं मीर के, गालिब के घराने वाले...
सरस्वती वंदना से काव्य पाठ की शुरुआत करने वाली युवा कवयित्री शिखा श्रीवास्तव ने नारी मन और देश के प्रति अपनी भावना को कुछ इस तरह से पंक्तियों में बयां किया -
मैं नारी हूं, नारी का सम्मान समेटे हूं, मातु शारदे ने जो दिया वरदान समेटे हूं। मुझमें गीतों गजलों का एक झरना बहता है, लेकिन दिल में जन गण मन का गान समेटे हूं।
इसके बाद उन्होंने पढ़ा-
हर एक सपना सच होगा ये आस जरूरी है, सीता हो तो राम के संग वनवास जरूरी है।
शिखा ने अंत में एक गजल के साथ अपने जज्बात बयां किए। उन्होंने पढ़ा-
हम नहीं इश्क का मेयआर गिराने वाले। कुछ कहें, कुछ भी कहें, हमको जमाने वाले। पुरअसर होते हैं अशआर हमारे भी ‘शिखा’, हम नहीं मीर के,गालिब के घराने वाले।
सरस्वती वंदना से काव्य पाठ की शुरुआत करने वाली युवा कवयित्री शिखा श्रीवास्तव ने नारी मन और देश के प्रति अपनी भावना को कुछ इस तरह से पंक्तियों में बयां किया -
मैं नारी हूं, नारी का सम्मान समेटे हूं, मातु शारदे ने जो दिया वरदान समेटे हूं। मुझमें गीतों गजलों का एक झरना बहता है, लेकिन दिल में जन गण मन का गान समेटे हूं।
इसके बाद उन्होंने पढ़ा-
हर एक सपना सच होगा ये आस जरूरी है, सीता हो तो राम के संग वनवास जरूरी है।
शिखा ने अंत में एक गजल के साथ अपने जज्बात बयां किए। उन्होंने पढ़ा-
हम नहीं इश्क का मेयआर गिराने वाले। कुछ कहें, कुछ भी कहें, हमको जमाने वाले। पुरअसर होते हैं अशआर हमारे भी ‘शिखा’, हम नहीं मीर के,गालिब के घराने वाले।
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डॉ अशोक अज्ञानी
- फोटो : amar ujala
आपनि भाषा आपनि बानी अम्मा हैं...
गांव की सोंधी मिट्टी की महक और अपनत्व भरी अवधी भाषा को अपनी कविताओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने वाले वरिष्ठ कवि डॉ. अशोक अज्ञानी ने मातृभाषा को अपनी मां का स्वरूप देते हुए जब विलक्षण कविता पढ़ी तो श्रोता झूम उठे। उन्होंने पढ़ा-
आपनि भाषा, आपनि बानी अम्मा हैं, भूली-बिसरी कथा किहानी अम्मा हैं। मुफति म माखन खॉंय घरैया सबै, मगर नाचैं दिनु भरि एकु मथानी अम्मा हैं। पूरे घर का भारु उठाये खोपड़ी पर जस ट्राली मा परी कमानी अम्मा हैं। ना मानों तो गांव-गली की गड़ही हैं, मानों तो गंगा महरानी अम्मा हैं।
इसके बाद उन्होंने अवधी की एक और रचना से श्रोताओं को आनंद का रसास्वादन कराते हुए पढ़ा-
अनुभाव, विभाव प्रभाव करैं, रस-राशि तबै रसियावत है।
जब नैन मिलैं तब चैन मिलै, उर तो उर का उरझावत है।
गांव की सोंधी मिट्टी की महक और अपनत्व भरी अवधी भाषा को अपनी कविताओं के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने वाले वरिष्ठ कवि डॉ. अशोक अज्ञानी ने मातृभाषा को अपनी मां का स्वरूप देते हुए जब विलक्षण कविता पढ़ी तो श्रोता झूम उठे। उन्होंने पढ़ा-
आपनि भाषा, आपनि बानी अम्मा हैं, भूली-बिसरी कथा किहानी अम्मा हैं। मुफति म माखन खॉंय घरैया सबै, मगर नाचैं दिनु भरि एकु मथानी अम्मा हैं। पूरे घर का भारु उठाये खोपड़ी पर जस ट्राली मा परी कमानी अम्मा हैं। ना मानों तो गांव-गली की गड़ही हैं, मानों तो गंगा महरानी अम्मा हैं।
इसके बाद उन्होंने अवधी की एक और रचना से श्रोताओं को आनंद का रसास्वादन कराते हुए पढ़ा-
अनुभाव, विभाव प्रभाव करैं, रस-राशि तबै रसियावत है।
जब नैन मिलैं तब चैन मिलै, उर तो उर का उरझावत है।