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पापा ही जिनके लिए मां हैं... मदर्स डे स्पेशल स्टोरी

Sun, 14 May 2017 01:37 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 14 May 2017 01:37 PM IST
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mothers day special stories.
- फोटो : amar ujala

एक बहुत ही पुरानी फिल्म के गीत के बोल हैं, मां की जगह बाप ले नहीं सकता, लोरी दे नहीं सकता...। बरबस ही ये पंक्तियां याद आईं, उन पिताओं से मिलकर, दुर्भाग्यवश जिनकी पत्नियां दुनिया में नहीं रहीं। सच है कि पिता बनना आसान है, लेकिन मां बनना बहुत मुश्किल।



नियति ने उनका हमसफर तो छीना ही, उनके बच्चों के सिर से मां का साया भी उठ गया। चुनौती थी, बच्चों को माता और पिता दोनों का प्यार देना, दोनों की तरह ही परवरिश करना।

परिवार और समाज ने समझाया, दबाव बनाया कि दूसरी शादी कर लो, बच्चों को मां मिल जाएगी, पर उन्होंने नियति के फैसले को स्वीकार किया।

उन्होंने ठान लिया कि वे खुद मां की भूमिका निभाएंगे और माता-पिता दोनों बनकर पालेंगे अपने बच्चों को। इस मदर्स-डे हम सैल्यूट करते हैं कुछ ऐसे पिता को जिन्होंने मां बनकर बच्चों को पाला। आज मदर्स-डे पर ‘अमर उजाला’ की खास पेशकश...।

सख्ती छोड़ ममता की छांव तले पाला

mothers day special stories.

पिता- उमाशंकर शुक्ला, एडवोकेट, हाईकोर्ट
बच्चे- शिप्रा, दिव्या, प्रिया और दिव्यांश

रिसर्च स्कॉलर शिप्रा बताती हैं कि 2012 में मम्मी उमा शुक्ला हमें छोड़ कर दुनिया से चली गईं। उन्हें कभी सर्दी-जुकाम तक नहीं हुआ। पर, एक दिन हमें पता चला कि उन्हें कैंसर था।

पापा उमाशंकर हाईकोर्ट में एडवोकेट हैं। उन्होंने मम्मी की बीमारी की बात हम तक आने नहीं दी। सिर्फ बड़ी दीदी प्रिया को मालूम था, क्योंकि वह मम्मी के साथ पीजीआई जाती थीं। इलाज काम नहीं आया और मम्मी की डेथ हो गई। इसके बाद बड़ी दीदी बेहद सदमे में थीं, भाई तीन साल का था। हम सबको संभालने के लिए पापा ने खुद को बदल लिया। हमने महसूस किया कि पापा अब सख्त नहीं रह गए। उन्होंने हमें डांटना छोड़ दिया।

हमारे खाने, स्कूल-कॉलेज जाने, सुबह उठाने और सबके सोने के बाद खुद सोने की आदत उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई। इससे पहले तक यह सब काम मम्मी करती थीं। खाना भले ही हम बहनें बनातीं, लेकिन हमने खाया या नहीं, कौन बिना खाए सोया... हर छोटी-छोटी बातों का पापा ध्यान रखते हैं।

भाई सबसे छोटा है, अक्सर बिना खाना खाए सो जाता है। पापा कोर्ट से आने के बाद चैंबर में रहते हैं। वे बीच में काम छोड़कर आते हैं, भाई को जगाकर खाना खिलाते हैं, उसके कपड़े खुद धोते हैं। शायद यह काम मम्मी करतीं। हमारे लिए पापा ही मां हैं। मम्मी को हम सब मिस करते हैं। लेकिन पापा ने उनकी कमी कभी महसूस नहीं होने दी। मदर्स-डे पर हम उन्हें विश करते हैं। थैंक्यू एंड लवयू पापा।

हमारे लिए पापा ने खुद को बदल डाला

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पिता- मेहंदी अब्बास रिजवी, सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त, सोशल एक्टिविस्ट

बच्चे- बेटी एरम और बेटा अली। एक बेटी की डेथ हो चुकी है।

बेटी एरम शादीशुदा हैं और अली एनीमेशन फील्ड से हैं। अली कहते हैं कि हम तीन भाई बहन थे। एक बहन की डेथ हो चुकी है। 2007 में मम्मी की डेथ हुई। डॉक्टरों ने बताया कि ब्लड में ऑक्सीजन कम हो गई थी। उस वक्त हम तीनों 13, 15 और 17 साल के थे।

अली कहते हैं कि उस वक्त पापा से सबने दूसरी शादी की जिद की। पर उन्होंने साफ कह दिया कि मैं अपने और बच्चों के बीच किसी तीसरे को जगह नहीं दे सकता। उस दिन के बाद से पापा बदल गए। उनके उठने-सोने का टाइम हमारे हिसाब से तय होने लगा।

पूरी लाइफ स्टाइल में हमने बदलाव देखा। वे हमें कम डांटने लगे, हमारे फ्रेंड बन गए। उनका ज्यादा से ज्यादा समय हमारे लिए हो गया। शायद मां होती तो यह न होता। पर, उन्होंने मां की तरह दुलार दिया... पापा की तरह गाइड किया। हैप्पी मदर्स-डे पापा।

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हम तो पापा को ही मदर्स-डे विश करते हैं

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पिता- चंद्रिका प्रसाद, रेलवे एम्प्लाई
बच्चे- चारू बैंक ऑफिसर और अपूर्वा बीकॉम स्टूडेंट

हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में सलेक्ट हुईं चारू कहती हैं हम दोनों बहनें सिर्फ आठ और तीन साल की थीं, जब 2001 में ब्रेन ट्यूमर से मम्मी की डेथ हुई। घर के बड़ों ने बताया कि उस वक्त हमारी छोटी उम्र देख पापा पर बहुत प्रेशर था कि शादी कर लें।

सबने कहा एक पिता के लिए बेटियों को पालना मुश्किल होगा। लेकिन पापा ने ना कर दिया। कहा, नहीं मैं ही इनका मां और पिता दोनों बनूंगा। इसके बाद पापा ने नौकरी के साथ-साथ हमें पाला। हमारी हर छोटी-बड़ी जरूरतों का ध्यान रखा। क्या गलत है क्या सही है, इसकी समझ दी।

उन्होंने लड़की होने के बंधन हम पर कभी नहीं थोपे, लेकिन जो कुछ भी एक मां बेटियों को सिखाती है वो भी सिखाया। चाहे खाना बनाना हो या फिर दुनियादारी। हमारे लिए हमारे पापा दुनिया के बेस्ट पापा हैं जो हमारी मम्मी भी हैं।

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