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वैलेंटाइन डे स्पेशल: रील लाइफ नहीं ये हैं रियल लाइफ 'लव स्टोरीज'

Tue, 14 Feb 2017 07:01 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 14 Feb 2017 07:01 AM IST
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love stories of real lives for valentines day.
- फोटो : amar ujala

यह बाजी इश्क की बाजी है, जो चाहे लगा दो डर कैसा।


गर जीत गए तो कहना क्या, हारे भी तो बाजी मात नहीं।।

14 फरवरी, वैलेंटाइन डे पर फैज अहम फैज के यह अल्फाज उनके  लिए, जिनकी प्रेम कहानी सच है, पर लगती बिल्कुल फिल्मी है। 15-20 वर्षों का लंबा वक्त उन्होंने साथ गुजारा है। दुनियादारी, जिंदगी की उलझनें व तमाम उतार-चढ़ाव उन्होंने भी देखे।

इसके बावजूद वह हमेशा एक-दूसरे की ताकत बन खड़े रहे। जात-बिरादरी, मजहब, सामाजिक बंदिशों की छाया उन्होंने अपने रिश्ते पर नहीं पड़ने दी। एक दूसरे का सम्मान, छोटे-छोटे समझौते का खाद-पानी देकर वे रिश्तों को और मजबूत बना रहे हैं। वैलेंटाइन डे पर पेश है....‘रील लाइफ सी रीयल लव स्टोरीज’

love stories of real lives for valentines day.

कहानी थोड़ी फिल्मी है, कुछ-कुछ टू स्टेट्स जैसी
निवेदिता, रिसर्च स्कॉलर
डॉ. संतोष शाह, वैज्ञानिक, बीएसआईपी
विवाह : 4 जुलाई 2010

निवेदिता कहती हैं- मैं बीएसआईपी में रिसर्च स्कॉलर थी और संतोष साइंटिस्ट। हम दोनों का ही सफर इस वैज्ञानिक संस्थान से शुरू हुआ। हम मिले, एक कनेक्शन हमारे बीच बन चुका था। हम लोग इलाहाबाद में बस चुके थे, संतोष की फैमिली कलिंगपोंग, सिलीगुड़ी में रहती थी। जब हमने घरवालों को शादी का फैसला सुनाया तो उन्होंने ‘टू स्टेट्स’ का अंतर बताकर साफ कह दिया कि हमारी-उनकी संस्कृति में बहुत अंतर है। जॉइंट फैमिली में रहती थी, चाचा-चाची और मां मिलकर फैसले करते थे। चाची के पापा यानी नानाजी ही थे, जो हमें समझ रहे थे। इस बीच मुझे प्रोजेक्ट के सिलसिले में अमेरिका जाना पड़ गया। हम दोनों ही कोशिश कर रहे थे कि हमारी फैमिली मान जाए। आखिरकार हमारी कोशिश रंग लाई और चार जुलाई 2010 में हम दोनों की लव मैरिज को अरेंज कर दिया गया। यूं कहिए प्यार की जीत हुई।

इसलिए निभ रही है हमारी शादी : संतोष और निवेदिता कहते हैं कि एक-दूसरे को बदलने की कोशिश न करें। परिवार को भी उसी रूप में स्वीकार करें। परंपराएं अलग-अलग होंगी तो क्या, दोनों को समझें, सम्मान करना सीखें। रिश्ते हमेशा मजबूत बने रहेंगे।

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रॉन्ग नंबर ने जोड़े दिल के तार
नैना, हाउस वाइफ
नीरज यादव, बिजनेसमैन
विवाह : 16 मार्च 1999

नीरज हंसते हुए कहते हैं कि गनीमत है कि उस दौर में 1090 सेवा नहीं थी... वरना लॉकअप में होता। दरअसल हमारी मुलाकात एक इत्तेफाक थी। पीसीओ से किसी को फोन करने गया था। रॉन्ग नंबर लग गया और यह गलत नंबर नैना के घर का था। आवाज ऐसी दिल को छू गई कि बार-बार रॉन्ग नंबर लगाने लगा। यह 1996-97 की बात है। रॉन्ग नंबर से हमारे दिल के तार जुड़ चुके थे। दिल मिले, तय किया कि शादी करनी है। अब शुरू हुआ घरवालों का विरोध, खासकर नैना की मम्मी को रिश्ता मंजूर नहीं था। खैर, धीरे-धीरे मैं इनके और घरवालों के दिल में जगह बना चुका था। पापा ने सपोर्ट किया और हमें कोर्ट मैरिज की इजाजत दे दी। मुझे हाईस्कूल की मार्क्सशीट चाहिए थी, उन्होंने कूरिअर से भेजी। खैर, लव मैरिज जब कोर्ट मैरिज में बदली तो अरेंज भी खुद-ब-खुद हो गई। हालांकि घोड़ी चढ़ने का अरमान पूरा न हुआ, पर फिर हमने रिसेप्शन देकर सामाजिक स्वीकृति ले ली।

इसलिए मजबूत है हमारा रिश्ता
हम एक-दूसरे को स्पेस देते हैं। हर किसी की भावनाओं का सम्मान करते हैं और एक -दूसरे का मजबूत सहारा बनकर खड़े रहते हैं। इसी कारण 17 साल से हमारी शादी सफल है।

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80 हजार किमी. तक दौड़ी ‘प्यार की गाड़ी’
डॉ. नीरज, प्लास्टिक सर्जन, केजीएमयू
डॉ. आरती, गाइनेकोलॉजिस्ट

अपनी वैलेन्टाइन के लिए कुछ नया प्लान करने में व्यस्त केजीएमयू में प्लास्टिक सर्जन डॉ. नीरज की लव स्टोरी भी कम फिल्मी नहीं। कहते हैं कि इंटर के बाद हमने कोचिंग जॉइन किया था। वहीं, आरती से पहली मुलाकात हुई। कोचिंग का प्यार खामोश वादे का रूप इख्तियार कर चुका था। हमने घरवालों को अपना फैसला सुनाया। मेरी मां राजी नहीं थीं। आरती के घरवालों ने उसका कोचिंग जाना बंद करवा दिया। खैर, हमने कुछ दिन न मिलने और पढ़ाई पर फोकस्ड रहने का फैसला किया। इस बीच मेरा सेलेक्शन हुआ, मैं एमबीबीएस करने कानपुर पहुंच गया। धीरे-धीरे आरती भी बाहर निकली और उसका इलाहाबाद में एडमिशन हुआ। मेरे पापा ने साथ दिया और मुझे एक मारूति 800 दिला दी। फिर क्या था कानपुर से लखनऊ और इलाहाबाद के बीच मेरी गाड़ी 80 हजार किलोमीटर तक दौड़ती रही। हमारा प्यार जीत गया और घरवालों को भी मानना पड़ा।

रिश्तों के लिए यह जरूरी है : नीरज-आरती कहते हैं कि हम हद से ज्यादा झगड़ा करते हैं। पर तभी तक नाराज रहते हैं, जब तक कि दोनों में से कोई परेशान नहीं। यदि एक भी परेशान होता है तो हम तुरंत नाराजगी छोड़ बैकफुट पर आते हैं। फिर पहल कौन करेगा सॉरी बोलने की यह मायने नहीं रखता। बस एक दूसरे की खुशी ही मायने रखती है।

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इश्क पर फिदा मजहब
निधि खान, टीचर
जावेद, सेक्रेटरी, यूपी ताइक्वॉन्डो एसोसिएशन
निधि-जावेद कहते हैं कि बात जब हिंदू-मुस्लिम धर्म की आती है तो हौव्वा सा खड़ा कर दिया जाता है। अरे, धर्म कोई भी इंसान एक ही मिट्टी का बना है। निधि कहती हैं कि जिस स्कूल में मैं टीचर थी, वहीं जावेद जूडो के कोच थे। मुलाकातों और बातों का सिलसिला वहीं से शुरू हुआ। हमें पता ही नहीं चला कि हम एक-दूसरे से प्यार करने लगे थे। धर्म ने प्यार को रोका नहीं। घरवालों को बताया, विरोध शुरू हो गया। हमने तय किया कि घरवालों की रजामंदी से ही शादी करेंगे। मुश्किल था, लेकिन इश्क पर मजहब फिदा हो चुका था। घरवाले मान गए।

ऐसे निभा रहे साथ : निधि कहती हैं कि मुझ पर कभी बुरका पहनने का दबाव नहीं डाला। मुझे भरपूर आजादी मिली। शुरू-शुरू में अलग रस्म रिवाज की वजह से दिक्कत आई, फिर हम एक-दूसरे के तीज-त्यौहार को मिलकर मनाने लगे। हिंदू त्यौहारों पर अपने मायके जाती जावेद के साथ और मुस्लिम त्यौहार को ससुराल में मनाती। बस सब कुछ आसान हो गया। 23 साल से यह रिश्ता यूं ही निभता चला आ रहा है।

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