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इनकी दरियादिली को सलाम, दूसरों की जिंदगी रोशन करने को अपने कलेजे के टुकड़े का किया देहदान

Thu, 17 Jan 2019 04:33 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 17 Jan 2019 04:33 PM IST
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know the parents who donates their children's body
डेमो
देहदान के प्रति लोगों की आस्था बढ़ने लगी है। अब लोग दूसरों की जिंदगी में उजाला फैलाने के लिए अपने कलेजे के टुकड़े का भी देहदान करने में पीछे नहीं हैं। अब तक तीन दंपती अपने बच्चों का देहदान कर चुके हैं, जबकि राजधानी में मानसिक बीमार बच्चों की सेवा में जुटी संस्था दृष्टि सामाजिक संस्थान 12 लावारिस बच्चों का देहदान करा चुकी है। देहदान कराने वालों से बात की गई तो उनका साफ कहना था कि वे अपने क लेजे के टुकड़े के जरिए दूसरों की जिंदगी में उजाला फैलाने चाहते हैं। उनके बच्चे की आंखों से अगर कोई इस खूबसूरत दुनिया देख सके तो उन्हें खुशी होगी। वहीं उस शरीर के जरिए चिकित्सा छात्र खुद को हुनरमंद बनाकर दूसरों की जिंदगी बचा सकेंगे। पेश है अपने बच्चों का देहदान कराने वाले ऐसे ही अभिभावकों से खास बातचीत :
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विभूति नारायण सिंह - फोटो : amar ujala
एक दिन के बच्चे का किया देहदान
हरदोई जिले के कछौना थाना क्षेत्र के गैसिंहपुर निवासी और प्राइवेट स्कूल में अध्यापक विभूति नारायण सिंह और उनकी पत्नी ने वर्ष 2011 में अपने एक दिन के बच्चे का देहदान कर पूरे इलाके में इतिहास रचा था। विभूति बताते हैं कि उस वक्त देहदान के बारे में सोचने तक का विरोध होता था। एक दिन के बच्चे का देहदान किया तो पूरा परिवार और समाज नाराज था, लेकिन बाद में सभी राजी हो गए। उन्होंने बताया कि प्रसव के बाद बच्चे को केजीएमयू में भर्ती कराया गया, लेकिन 12 घंटे बाद ही उसकी मौत हो गई। बेटी के देहदान को लेकर पत्नी को समझाया तो वह राजी हो गई। मन में लालसा थी कि उनके बच्चे की आंखों से उनकी दुनिया में उजाला फैल सके, जो इस खूबसूरत दुनिया को नहीं देख पा रहे हैं। साथ ही मेडिकलछात्र उन बीमारियों के बारे में भी अध्ययन कर पारंगत बन सकें, जिसकी वजह से हमारे बच्चे की मौत हुई। विभूति ने बताया कि  बेटी का देहदान करने के बाद एक बेटा है।
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संजय विश्वकर्मा - फोटो : amar ujala
समाज को जागरूक करना ही था मेरा मकसद
छितवापुर मजावा लालकुआं निवासी व्यवसायी संजय विश्वकर्मा और मनीषा विश्वकर्मा ने अपने पांच साल के बेटे आयुष (5) की मृत्यु होने पर मंगलवार को देहदान किया है। संजय ने बताया कि बच्चा जन्म से मानसिक रूप से बीमार था। उसका काफी इलाज कराया गया, लेकिन बचाया नहीं जा सका। देहदान के पीछे मूल मकसद था कि केजीएमयू के मेडिकल छात्रों की पढ़ाई बेहतरीन हो सके। उनके बच्चों की आंखों की रोशनी से दूसरे लोग इस दुनिया को देख सकें। अभी तक देहदान के लिए कम लोग आगे आ रहे हैं। लेकिन बच्चे का देहदान कर समाज को इसके प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया है। बेटा इस दुनिया में नहीं रहा, लेकिन इस बात का संतोष रहेगा कि उसकी आंखों से कोई न कोई इस दुनिया को देख रहा है और उसका शरीर किसी न किसी रूप में पूरे समाज के काम आ रहा है।
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- फोटो : डेमो
केजीएमयू में किसी बच्चे का पहला देहदान
राजाजीपुर निवासी विनोद गौतम और सविता ने 19 दिन के बच्चे का देहदान कर लोगों को नया संदेश दिया था। 12 जून 2011 को केजीएमयू में किसी बच्चे का यह पहला देहदान था। विनोद ने बताया कि विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों में देहदान को लेकर लोगों को जागरूक करते देखा और सुना था। 23 मई को बच्ची पैदा हुई। उसे केजीएमयू में भर्ती कराया गया। चिकित्सकों के तमाम प्रयास के बाद भी 12 जून को उसकी मौत हुई तो पूरा परिवार टूट गया था। समाज के प्रति अपना दायित्व समझते हुए 19 दिन की बच्चे की देहदान किया। 
 
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लावारिस के शव का वारिस है केजीएमयू
मानसिक रूप से बीमार बच्चों की देखभाल करने वाली संस्था दृष्टि सामाजिक संस्थान के रोहित बताते हैं कि चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की संस्तुति पर उनके यहां बच्चों की देखरेख होती है। इस दौरान दम तोड़ने वाले बच्चों की देह केजीएमयू को दान कर दी जाती है। देहदान के पीछे मकसद है कि मेडिकल केछात्र बेहतर पढ़ाई और शोध कर सकें। नेत्र का कार्निया अंधता के शिकार लोगों को प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। इससे वे भी दुनिया देख सकते हैं। उन्होने बताया कि करीब 12 बच्चों की देह दान कर चुकेहैं।
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