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सुना है क्या: सहमे-सहमे से बाहुबली, ऐन समय पर साहब गायब; 'आने से ज्यादा जाने वाले' के पढ़ें किस्से

Wed, 07 Oct 2026 12:48 PM IST
Akash Dwivedi डिजिटल डेस्क, लखनऊ
डिजिटल डेस्क, लखनऊ Published by: Akash Dwivedi Updated Wed, 07 Oct 2026 12:48 PM IST
सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

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Have you heard? Strongmen are jittery, and the 'boss' vanishes at the crucial moment; read the tales of those
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'सहमे-सहमे से बाहुबली' की कहानी। इसके अलावा 'ऐन समय पर साहब गायब' और '...आने से ज्यादा जाने वाले' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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सहमे-सहमे से बाहुबली

सूबे के एक पूर्व माननीय अपने बाहुबल के लिए कई राज्यों में मशहूर हैं। कई कांडों के बाद बीते दिनों कफ सिरप मामले में भी उनका नाम उछला था। उस मुसीबत से तो किसी तरह बच गए, लेकिन अब दूसरे राज्य की पुलिस के रडार पर आ गए। इसके बाद ऐसी शामत आई कि भूमिगत होना ही ठीक लगा। अब लंबे समय बाद उनकी सक्रियता फिर बढ़ी है। जरूर फिर कुछ मैनेजमेंट किया होगा। किसी ने खूब कहा है, 'बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी, कभी तो शामत आएगी'...

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ऐन समय पर साहब गायब

प्रदेश में युवाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार के लिए तैयार करने वाले एक विभाग में आजकल खूब हंगामा मचा हुआ है। आए दिन प्रशिक्षण देने वाले अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। खास बात यह है कि उनकी समस्याओं के समाधान की जगह विभाग के मुखिया साहब ही गायब हो जा रहे हैं। चर्चा है कि ऊपर के कड़े निर्देश के बावजूद साहब अपनी मनमानी पर अड़े हैं। हालत यह है कि उनके चक्कर में जब बड़े साहब घिर गए तो उन्होंने कड़ी नाराजगी जताते हुए वार्ता का समय तय कर दिया। ऐसे में अब साहब कैसे गायब होंगे?

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आने से ज्यादा जाने वाले

बड़े-बड़े शहरों में बड़े लोगों के कारोबारी दुख हरने के लिए मोटे पैकेज पर थोक में भर्तियां की गई हैं। उनका काम कारोबारियों के लिए 'संकटमोचक' की भूमिका निभाना है। काम भी कर रहे हैं, लेकिन विभाग में आयातित एक साहब उन्हें 'बंधुआ मजदूर' समझ बैठे।

सुबह से देर रात तक काम और सिर्फ काम... संडे हो या मंडे... काम ही काम। जो न आए, उसके साथ मदर इंडिया के सुक्खी लाला जैसा बर्ताव। बाहर से आए साहब से त्रस्त युवा नौकरी छोड़ रहे हैं। एक तरफ भर्तियां हो रही हैं तो दूसरी ओर पुराने कम होते जा रहे हैं।

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