ये लक्षण दिखें तो हो जाएं सावधान, कहीं इस बीमारी की गिरफ्त में आपका बच्चा भी तो नहीं
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एक तरफ जहां सोशल मीडिया खुलापन लेकर आया है, लोग पहले से कहीं ज्यादा मुखर हुए हैं, वहीं दूसरी ओर अपेक्षाओं पर खरे न उतर पाने का डर युवाओं को गिरफ्त में ले रहा है। इसका युवाओं पर कैसा असर पड़ रहा है, ये जानने के लिए केजीएमयू के मनोचिकित्सक डॉ. आदर्श त्रिपाठी से हमने बात की। डॉ. त्रिपाठी बताते हैं,मैं एक दिन की ओपीडी में कम से कम सात ऐसे मरीजों को तो देखता ही हूं। इनका औसत मान लिया जाए तो एक सप्ताह में 30-40 मरीज केजीएमयू के ही मानसिक रोग विभाग में आ जाते हैं। वहीं, मनोचिकित्सक व बीबीएयू में चीफ साइकोलॉजिकल काउंसलर डॉ. नेहा आनंद बताती हैं कि मैं हफ्ते में चार से पांच ऐसे मरीज देखती हूं। इस सबका कितना बुरा असर मरीज की जिंदगी पर पड़ता है, इस सवाल पर वे बताती हैं कि सही इलाज न होने पर उम्र के साथ बढ़ता जाता है और कई अन्य शारीरिक व मानसिक बीमारियों का शिकार बनाता है।
इन मामलों से जानिए कैसे बढ़ रहा अपेक्षाओं पर खरे उतरने का डर
वह स्कूल में अच्छा प्रदर्शन कर रही थी, पर दो महीने से जाना ही बंद
शहर के जाने-माने स्कूल में हाईस्कूल की छात्रा (16-17 वर्ष) का इलाज केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग में चल रहा है। उसकी परेशानी तब पता चली जब उसे अकेले प्रेजेंटेशन देने के लिए स्कूल ने कहा। वह ग्रुप में तो अच्छा करती थी, लेकिन अकेले प्रेजेंटेशन देने के नाम पर वह चिंतित रहने लगी। वह कक्षा में पीछे बैठने लगी। उसके प्रदर्शन पर भी असर पड़ा। वह स्कूल में किसी से बात करने से भी कतराने लगी। कक्षा में जाने के नाम पर भी उसे डर लगने लगा। वह सोचती कि सब उसे घूर रहे हैं, मजाक उड़ा रहे हैं। बीते दो-ढाई महीने से उसने स्कूल जाना बंद कर दिया है।
प्रमोशन के बाद ब्रिटेन जाने को कहा गया तो घबराने लगा
लखनऊ का 25 साल का युवक बीटेक करने के बाद नौकरी करने बेंगलूरू चला गया। उसका मेल-मिलाप कम था। वह ज्यादातर समय कंप्यूटर पर बिताता था। हालांकि उसका काम अच्छा था। कम समय में ही उसका प्रमोशन हुआ और उसे टीम लीडर के रूप में ब्रिटेन जाने को कहा गया। वह इसको लेकर घबराने लगा कि बाहर कैसे जाऊंगा? क्या वहां बेहतर प्रदर्शन कर पाऊंगा? मैं इस काबिल नहीं था, यह प्रमोशन मुझे यूं ही मिल गया...। उसने यह सब दोस्त से बताया। उसने मनोचिकित्सक को दिखाने की सलाह दी। काउंसलिंग व कुछ दवाओं के बाद उसकी चिंता कम हुई और वह विदेश गया।
लखनऊ का 25 साल का युवक बीटेक करने के बाद नौकरी करने बेंगलूरू चला गया। उसका मेल-मिलाप कम था। वह ज्यादातर समय कंप्यूटर पर बिताता था। हालांकि उसका काम अच्छा था। कम समय में ही उसका प्रमोशन हुआ और उसे टीम लीडर के रूप में ब्रिटेन जाने को कहा गया। वह इसको लेकर घबराने लगा कि बाहर कैसे जाऊंगा? क्या वहां बेहतर प्रदर्शन कर पाऊंगा? मैं इस काबिल नहीं था, यह प्रमोशन मुझे यूं ही मिल गया...। उसने यह सब दोस्त से बताया। उसने मनोचिकित्सक को दिखाने की सलाह दी। काउंसलिंग व कुछ दवाओं के बाद उसकी चिंता कम हुई और वह विदेश गया।