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मातृभाषा को मान दिलाने के लिए जारी है इन हिंदी सेवियों का संघर्ष
Tue, 08 Sep 2020 04:50 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
अभिषेक सहज, अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक सहज, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Tue, 08 Sep 2020 04:50 PM IST
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रंगनाथ मिश्र, ओम नीरव
- फोटो : amar ujala
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मातृभाषा हिंदी को मान दिलाने के लिए राजधानी में बहुत से लोग लंबे समय से अपने-अपने तरीके से प्रयास में जुटे हैं। कोई हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा की मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहा है तो कोई जिलों में घूम-घूमकर हिंदी के प्रचार प्रसार में जुटा है।
अजय प्रसून
- फोटो : amar ujala
‘अनागत कविता’ को स्थापित करने में लगे अजय प्रसून
साहित्यकार अजय प्रसून ने हिंदी में अनागत कविता की शुरूआत का बीज 1972 में डाला था। अपनी संस्था अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान के माध्यम से अजय प्रसून सैकड़ों रचनाकारों को काव्य गोष्ठियों में मंच दे चुके हैं। वे बताते हैं कि अनागत का मतलब होता है भविष्य की कविता। कठिन वर्तमान में जीते हुए स्वर्णिम भविष्य की कल्पना के लिखी गई कविता ही अनागत कहलाती है। एक दर्जन से ज्यादा काव्य संग्रह लिख चुके अजय प्रसून को 1981 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से उन्हें बाल साहित्य का अनुशंसा पुरस्कार भी मिला था। वे कई वर्षों से लगातार हर माह एक काव्य गोष्ठी का आयोजन करते हैं।
साहित्यकार अजय प्रसून ने हिंदी में अनागत कविता की शुरूआत का बीज 1972 में डाला था। अपनी संस्था अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान के माध्यम से अजय प्रसून सैकड़ों रचनाकारों को काव्य गोष्ठियों में मंच दे चुके हैं। वे बताते हैं कि अनागत का मतलब होता है भविष्य की कविता। कठिन वर्तमान में जीते हुए स्वर्णिम भविष्य की कल्पना के लिखी गई कविता ही अनागत कहलाती है। एक दर्जन से ज्यादा काव्य संग्रह लिख चुके अजय प्रसून को 1981 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से उन्हें बाल साहित्य का अनुशंसा पुरस्कार भी मिला था। वे कई वर्षों से लगातार हर माह एक काव्य गोष्ठी का आयोजन करते हैं।
रंगनाथ मिश्र
- फोटो : amar ujala
हिंदी के लिए डॉ. रंगनाथ मिश्र ने पकड़ी आंदोलनों की राह
78 वर्षीय साहित्यकार डॉ. रंगनाथ मिश्र को हिंदी के उत्थान के लिए किए गए उनके आंदोलनों के लिए जाना जाता है। करीब पचास वर्षों से वे हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए पूरे भारत में घूमते रहे। उन्होंने 1966 में अगीत आंदोलन चलाया तो वहीं 1975 में संतुलित कहानी आंदोलन और फिर संघात्मक समीक्षा पद्धति जैसे अनेकों आंदोलनों के वे जनक रहे। परिवहन विभाग से वर्ष 2000 में सेवानिवृत्त रंगनाथ मिश्र कई दशकों से एक मार्च को अपने जन्मदिवस को साहित्यकार दिवस केरूप में मनाते रहे जिसमें बहुत से नए और पुराने रचनाकारों का सम्मान और प्रोत्साहन भी किया जाता रहा। वर्ष 2014 में उन्हें उनकी हिंदी सेवा के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से साहित्य भूषण पुरस्कार से नवाजा गया। 1966 में उन्होंने अखिल भारतीय अगीत परिषद की स्थापना की जो आज भी नए रचनाकारों को प्रोत्साहन का कार्य कर रही है। उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हुईं जबकि उन्होंने बहुत सी पुस्तकों का संपादन किया। रंगनाथ मिश्र बताते हैं कि अमर उजाला के अभियान से नई पीढ़ी केरचनाकारों को बहुत फायदा होगा और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
78 वर्षीय साहित्यकार डॉ. रंगनाथ मिश्र को हिंदी के उत्थान के लिए किए गए उनके आंदोलनों के लिए जाना जाता है। करीब पचास वर्षों से वे हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए पूरे भारत में घूमते रहे। उन्होंने 1966 में अगीत आंदोलन चलाया तो वहीं 1975 में संतुलित कहानी आंदोलन और फिर संघात्मक समीक्षा पद्धति जैसे अनेकों आंदोलनों के वे जनक रहे। परिवहन विभाग से वर्ष 2000 में सेवानिवृत्त रंगनाथ मिश्र कई दशकों से एक मार्च को अपने जन्मदिवस को साहित्यकार दिवस केरूप में मनाते रहे जिसमें बहुत से नए और पुराने रचनाकारों का सम्मान और प्रोत्साहन भी किया जाता रहा। वर्ष 2014 में उन्हें उनकी हिंदी सेवा के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से साहित्य भूषण पुरस्कार से नवाजा गया। 1966 में उन्होंने अखिल भारतीय अगीत परिषद की स्थापना की जो आज भी नए रचनाकारों को प्रोत्साहन का कार्य कर रही है। उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हुईं जबकि उन्होंने बहुत सी पुस्तकों का संपादन किया। रंगनाथ मिश्र बताते हैं कि अमर उजाला के अभियान से नई पीढ़ी केरचनाकारों को बहुत फायदा होगा और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।
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ध्रुव चंद्र
- फोटो : amar ujala
हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा बनाने के प्रयास में जुटे ध्रुव चंद्र
64 वर्षीय हिंदी प्रेमी ध्रुव चंद्र मिश्रा पिछले चार वर्षों से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा के रूप में मान्यता दिलाने में प्रयासरत हैं। इसके लिए वे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और प्रदेश के कई मंत्रियों व अफसरों से लगातार पत्राचार कर रहे हैं। ध्रुव मिश्रा बताते हैं कि हम किसी भी भाषा के विरोधी नहीं हैं लेकिन अन्य भाषाओं की तरह करोड़ों लोगों के बोलचाल की भाषा हिंदी को भी संयुक्त राष्ट्र संघ सम्मान देते हुए मान्यता प्रदान करे। वे बताते हैं कि लंबे समय के पत्राचार के बाद राज्यपाल केउप सचिव नवीन चंद्र ने मार्च 2018 में इस संबंध में प्रमुख सचिव भाषा को भी उचित कार्रवाई के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश केदोनों सदनों से इस आशय का एक संकल्प प्रस्ताव पारित हो जिससे अन्य हिंदी भाषी प्रदेश और बाद में दक्षिण भारत केराज्यों में भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित कर संयुक्त राष्ट्र संघ को भेजा जाए। हालांकि वे इस बात से निराश भी हैं कि अभी तक उनके इतने पत्राचार के बावजूद कहीं से सकारात्मक सहयोग नहीं मिल पा रहा है।
64 वर्षीय हिंदी प्रेमी ध्रुव चंद्र मिश्रा पिछले चार वर्षों से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा के रूप में मान्यता दिलाने में प्रयासरत हैं। इसके लिए वे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और प्रदेश के कई मंत्रियों व अफसरों से लगातार पत्राचार कर रहे हैं। ध्रुव मिश्रा बताते हैं कि हम किसी भी भाषा के विरोधी नहीं हैं लेकिन अन्य भाषाओं की तरह करोड़ों लोगों के बोलचाल की भाषा हिंदी को भी संयुक्त राष्ट्र संघ सम्मान देते हुए मान्यता प्रदान करे। वे बताते हैं कि लंबे समय के पत्राचार के बाद राज्यपाल केउप सचिव नवीन चंद्र ने मार्च 2018 में इस संबंध में प्रमुख सचिव भाषा को भी उचित कार्रवाई के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश केदोनों सदनों से इस आशय का एक संकल्प प्रस्ताव पारित हो जिससे अन्य हिंदी भाषी प्रदेश और बाद में दक्षिण भारत केराज्यों में भी ऐसा ही प्रस्ताव पारित कर संयुक्त राष्ट्र संघ को भेजा जाए। हालांकि वे इस बात से निराश भी हैं कि अभी तक उनके इतने पत्राचार के बावजूद कहीं से सकारात्मक सहयोग नहीं मिल पा रहा है।
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संजय मिश्र
- फोटो : amar ujala
‘हिंदी रथ’ से मातृभाषा का प्रचार कर रहे संजय मिश्र
भारतीय भाषा विकास अभियान के संयोजक, शिक्षक व साहित्यकार संजय मिश्र ‘रजोल’ ने हिंदी के प्रचार-प्रसार का अलग ही तरीका अपना रखा है। वे 1996 से अपने दोपहिया वाहन जिस पर ‘हिंदी रथ’ लिखा हुआ है, से ही लखनऊ, रायबरेली, बाराबंकी और उन्नाव समेत अन्य जिलों में हिंदी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इस वाहन पर नंबर भी हिंदी में ही अंकित हैं। वे इसी वाहन से घूम-घूमकर छात्र-छात्राओं में हिंदी के प्रति आकर्षण पैदा कर रहे हैं। संजय मिश्र ने कहा कि अमर उजाला के अभियान ने उन्हें प्रोत्साहित किया है और वे अब ज्यादा लगन के साथ हिंदी के प्रसार में जुट गए हैं।
भारतीय भाषा विकास अभियान के संयोजक, शिक्षक व साहित्यकार संजय मिश्र ‘रजोल’ ने हिंदी के प्रचार-प्रसार का अलग ही तरीका अपना रखा है। वे 1996 से अपने दोपहिया वाहन जिस पर ‘हिंदी रथ’ लिखा हुआ है, से ही लखनऊ, रायबरेली, बाराबंकी और उन्नाव समेत अन्य जिलों में हिंदी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इस वाहन पर नंबर भी हिंदी में ही अंकित हैं। वे इसी वाहन से घूम-घूमकर छात्र-छात्राओं में हिंदी के प्रति आकर्षण पैदा कर रहे हैं। संजय मिश्र ने कहा कि अमर उजाला के अभियान ने उन्हें प्रोत्साहित किया है और वे अब ज्यादा लगन के साथ हिंदी के प्रसार में जुट गए हैं।