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यहां पर मरीजों से ज्यादा सरकारी अस्पतालों को 'इलाज' की जरूरत
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 07 Feb 2017 07:25 PM IST
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एक रुपये में पर्चा, पर फ्री इलाज के लिए इंतजार तीन घंटे
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लखनऊ। सरकारी अस्पतालों में एक रुपये के पर्चे पर इलाज, जांच से लेकर दवा तक फ्री। यह सुनने में भले ही सुकून देने वाला हो, लेकिन हकीकत इससे उलट है। राजधानी के सरकारी अस्पतालों मेंं फ्री इलाज के लिए आने वाले मरीजों का दर्द घंटों लंबी लाइनों में लगकर बढ़ जाता है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं तो बेहतर कर दी गईं, लेकिन प्रशासन भीड़ का प्रबंधन करना भूल गया। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारी सुविधाएं मरीजों का दर्द कम करने के बजाए बढ़ाने लगीं।
शहर के प्रतिष्ठित लोहिया और बलरामपुर अस्पताल तक में ऐसे हालात बने हुए हैं। प्रबंधन बेहतर करने के बजाए अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। प्रबंधन में लापरवाही का ही नतीजा है कि 100-100 बेड के पांच मदर एंड चाइल्ड हेल्थकेयर (एमसीएच) हॉस्पिटल हैं, लेकिन, स्टाफ नहीं होने का उलाहना देकर इन्हें शुरू नहीं कराया जा सका।
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शहर के प्रतिष्ठित लोहिया और बलरामपुर अस्पताल तक में ऐसे हालात बने हुए हैं। प्रबंधन बेहतर करने के बजाए अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। प्रबंधन में लापरवाही का ही नतीजा है कि 100-100 बेड के पांच मदर एंड चाइल्ड हेल्थकेयर (एमसीएच) हॉस्पिटल हैं, लेकिन, स्टाफ नहीं होने का उलाहना देकर इन्हें शुरू नहीं कराया जा सका।
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सुपरस्पेशिएलिटी पर फोकस, पर प्राइमरी हेल्थ सर्विस बदहाल
52 पीएचसी पर इलाज नहीं मिल रहा इलाज
2016 में कैंसर इंस्टीट्यूट मिला। ट्रॉमा की सुविधा केलिए दूसरा सेंटर शुरू हो गया। मेडिसिटी पर भी तेजी से काम चल रहा है। बलरामपुर हॉस्पिटल में भी सुपरस्पेशिएलिटी ब्लॉक बना, हालांकि यह उम्मीदों के मुताबिक चल नहीं सका। ट्रॉमा सेंटर-2 में भी इलाज नहीं मिल पा रहा है। इसके उलट 52 प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स (पीएचसी) पर भी इलाज उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। यहां डॉक्टर्स इलाज करने के लिए जाना तक नहीं चाहते। कम्युनिटी हेल्थ सेंटर्स (सीएचसी) की भी हालत संतोषजनक नहीं कही जा सकती। प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स पर इलाज नहीं मिलने की वजह से रेफरल केंद्र जैसे केजीएमयू तक में सामान्य मरीजों की भीड़ बढ़ रही है।
रोजाना कहां कितनी ओपीडी
सिविल हॉस्पिटल - 3800
बलरामपुर हॉस्पिटल - 5700
लोहिया हॉस्पिटल - 4800
केजीएमयू - 4500
लोहिया इंस्टीट्यूट - 1900
राजधानी में इलाज के सरकारी संसाधन
रेफरल केंद्र - केजीएमयू, एसजीपीजीआई, लोहिया इंस्टीट्यूट
जिला स्तरीय केंद्र - लोहिया हॉस्पिटल, भाऊराव देवरस संयुक्त अस्पताल, लोकबंधु हॉस्पिटल, डफरिन हॉस्पिटल।
प्राइमरी सेंटर्स - 52 पीएचसी, 9 सीएचसी, 8 बीएमसी।
रोजाना कहां कितनी ओपीडी
सिविल हॉस्पिटल - 3800
बलरामपुर हॉस्पिटल - 5700
लोहिया हॉस्पिटल - 4800
केजीएमयू - 4500
लोहिया इंस्टीट्यूट - 1900
राजधानी में इलाज के सरकारी संसाधन
रेफरल केंद्र - केजीएमयू, एसजीपीजीआई, लोहिया इंस्टीट्यूट
जिला स्तरीय केंद्र - लोहिया हॉस्पिटल, भाऊराव देवरस संयुक्त अस्पताल, लोकबंधु हॉस्पिटल, डफरिन हॉस्पिटल।
प्राइमरी सेंटर्स - 52 पीएचसी, 9 सीएचसी, 8 बीएमसी।
मरीजों का दर्द, अधिकारियों की दलील
20 प्रतिशत हर साल बढ़ रहे मरीज
ओपीडी से लेकर दवा काउंटर तक लाइन बढ़ा रही दर्द
लोहिया हॉस्पिटल में इलाज के लिए आए कुलदीप तिवारी का कहना था कि यहां हमेशा भीड़ होती है। प्राइवेट डॉक्टर को दिखाने में एक बार में करीब 500 से 700 रुपये का खर्चा होता है। इस भारी-भरकम खर्च से बचने के लिए यहां सुबह ही आ गया। साढ़े आठ बजे से पर्चा बनवाने के लिए लाइन में लगा। किसी तरह पर्चा बना तो डॉक्टर के कमरे के बाहर फिर से लाइन लगाई। इस लाइन से निकला तो दवा लेने केलिए मेडिसिन काउंटर पर लाइन में लगना पड़ा।
अधिकारी बोले-संसाधन में ही इलाज कर सकते
सीएमओ जीएस बाजपेई का कहना है कि भीड़ का हमारे पास कोई प्रबंधन नहीं है। हमारे पास जितने संसाधन हैं। उनका पूरा उपयोग किया जा रहा है। हर साल करीब 20 प्रतिशत मरीज बढ़ जाते हैं। आचार संहिता खत्म होने के बाद पांच एमसीएच को भी शुरू करा दिया जाएगा। इससे 500 बेड़ की क्षमता बढ़ जाएगी। इससे कुछ राहत मिलेगी।
लोहिया हॉस्पिटल में इलाज के लिए आए कुलदीप तिवारी का कहना था कि यहां हमेशा भीड़ होती है। प्राइवेट डॉक्टर को दिखाने में एक बार में करीब 500 से 700 रुपये का खर्चा होता है। इस भारी-भरकम खर्च से बचने के लिए यहां सुबह ही आ गया। साढ़े आठ बजे से पर्चा बनवाने के लिए लाइन में लगा। किसी तरह पर्चा बना तो डॉक्टर के कमरे के बाहर फिर से लाइन लगाई। इस लाइन से निकला तो दवा लेने केलिए मेडिसिन काउंटर पर लाइन में लगना पड़ा।
अधिकारी बोले-संसाधन में ही इलाज कर सकते
सीएमओ जीएस बाजपेई का कहना है कि भीड़ का हमारे पास कोई प्रबंधन नहीं है। हमारे पास जितने संसाधन हैं। उनका पूरा उपयोग किया जा रहा है। हर साल करीब 20 प्रतिशत मरीज बढ़ जाते हैं। आचार संहिता खत्म होने के बाद पांच एमसीएच को भी शुरू करा दिया जाएगा। इससे 500 बेड़ की क्षमता बढ़ जाएगी। इससे कुछ राहत मिलेगी।