लखनऊ पुलिस ने शनिवार को अजीत सिंह हत्याकांड के मुख्य शूटर पूर्वांचल के कुख्यात अपराधी गिरधारी विश्वकर्मा उर्फ डॉक्टर के एनकाउंटर का क्राइम सीन रिक्रिएट किया। बता दें कि मामले में परिजनों ने पुलिस पर गिरधारी की हत्या करने का आरोप लगाया था।
लखनऊ: पुलिस ने रिक्रिएट किया गिरधारी के एनकाउंटर का सीन, परिजनों ने लगाया था हत्या का आरोप
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राज्य सरकार की तरफ से अपर महाधिवक्ता विनोद कुमार शाही की दलील थी कि अभियोजन की स्वीकृति के बगैर सरकारी कर्मियों के खिलाफ वादी की अर्जी पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता था। ऐसे में सीजेएम का आदेश कानून की मंशा के खिलाफ होने की वजह से रद्द किए जाने लायक है।
सीजेएम लखनऊ की अदालत ने आजमगढ़ के सर्वजीत सिंह की अर्जी पर 26 फरवरी को एनकाउंटर टीम में शामिल रहे डीसीपी ईस्ट संजीव सुमन, विभूतिखंड थाने के इंस्पेक्टर चंद्रशेखर सिंह व अन्य पुलिस अफसरों-कर्मियों पर हत्या का केस दर्ज करने का आदेश दिया था।
सीजेएम की कोर्ट ने इस मामले में सुसंगत धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विवेचना का आदेश इंस्पेक्टर हजरतगंज को दिया था। साथ ही एफआईआर की प्रति सात दिन में अदालत में पेश करने को कहा था।
25 फरवरी को कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश देते हुए कहा था कि किसी एक घटना में मात्र एक पक्ष की ओर से ही मुकदमा दर्ज कराए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। घटना के दूसरे पक्ष को, जो खुद को घटना से या दर्ज मुकदमे से पीड़ित मानता है, उसे भी अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है।
कोर्ट ने कहा था कि थाने से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार एक व्यक्ति की मृत्यु मुठभेड़ के दौरान हुई। मृत्यु पुलिस द्वारा आत्मरक्षा में हुई या आत्मरक्षा के दायरे से बाहर जाकर कोई कृत्य किया गया, यह विवेचना का विषय है। अजीत हत्याकांड के आरोपी गिरधारी विश्वकर्मा उर्फ डॉक्टर की पुलिस कस्टडी के दौरान कथित मुठभेड़ में मौत मामले में सीजेएम सुशील कुमारी ने कहा था कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा निर्देश है कि संलिप्त पुलिस टीम के खिलाफ किसी नजदीकी थाने में मामला पंजीकृत होना चाहिए और उसकी विवेचना संलिप्त पुलिस टीम के मुखिया से वरिष्ठ श्रेणी के अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि मामले के संज्ञान के समय अभियोजन स्वीकृति के संदर्भ में यह स्थिति है कि मात्र प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया जाना संज्ञान लेने की परिधि में नहीं आता है। इसके साथ ही उक्त संरक्षण किसी भी लोक सेवक को ऐसे कृत्य के विरुद्ध प्राप्त नहीं होता, जिसमें स्वीकृत रूप से एक आपराधिक कृत्य हुआ है।