30 से 50 वर्ष की उम्र के बीच के लोग सबसे ज्यादा नाखुश हैं। इस उम्र के लोगों में तनाव व असंतुष्टि की समस्या अन्य से कहीं ज्यादा है। केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग की ओपीडी में तनाव व डिप्रेशन की समस्या लेकर आने वाले मरीजों में सबसे अधिक संख्या 30-50 के बीच की आयु केे हैं।
यह जानकारी केजीएमयू के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. विवेक अग्रवाल ने दी। उन्होेंने बताया कि इस उम्र के लोगों की नाखुशी का कारण कार्यक्षेत्र में होने वाली समस्याएं, बेरोजगारी व घरेलू झगड़े व अनबन होती है।
इनमें घरेलू महिलाओं की संख्या भी कम नहीं हैं। जॉब न करने वाली महिलाएं तनावग्रस्त हैं। वहीं 10 प्रतिशत बच्चे की पढ़ाई को लेकर तनावग्रस्त रहते हैं।
केजीएमयू मानसिक रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने बताया कि भावनाओं का स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है। यह बात वैज्ञानिक रूप से भी प्रमाणित हो चुकी है। उन्होंने बताया कि शरीर एक केमिकल बॉडी होती है इस पर भी भावनाएं गहरा असर करती हैं।
पहले वैज्ञानिकों की राय थी कि जेनेटिक प्रणाली परिवर्तित नहीं हो सकती, लेकिन अब शोध में ये बातें स्पष्ट हो चुकी हैं कि वातावरण व भावात्मक स्थिति से जीन में भी परिवर्तन होते है। अगर व्यक्ति खुश रहना है तो पॉजिटिव इमोशंस से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैं। खुश रहना जेनेटिक स्ट्रक्चर को मॉडिफाई कर सकता है। वहीं, तनाव लेने से मानसिक के साथ शारीरिक बीमारियां भी बढ़ती हैं।